Friday, 23 October 2020

पेसमेकर से मित्रता

                     पेसमेकर से मित्रता
               @ डा० विनोद कुमार तिवारी
अस्पताल में भर्ती होने की सूचना मैंने नहीं दी, या यों कहिए कि मैं यह करने की स्थिति में था ही नहीं । अब जब शल्यन के पश्चात 
आईसीयू में रहने, फिर एक सप्ताह पश्चात टांके कटने और उसके भी पर्याप्त विश्राम के बाद  स्वांतःसुखाय लिखे गए इस संस्मरण  के माध्यम से आपसे संवाद कर रहा हूँ ।

 हुआ यों कि मैं पिछले कई माह से कुछ सेकंड के लिए  कभी-कभार चेतना-शुन्यता का अनुभव करता था । कुछ ही पल में यह बिल्कुल सामान्य हो जाया करता था । चूंकि कोरोना संकट के उत्थान काल में अस्पतालों में जाना लगभग निषेध था , मैंने कई डाक्टर मित्रों से संवाद किया, उन्होंने इसे उम्र जनित बिल्कुल सामान्य प्रक्रिया बताया ।

अनलॉक के प्रथम चरण में जब विशेष ट्रेनें प्रारंभ हुईं और मई-जून के ग्रीष्मावकाश में हमलोग गृहनगर रांची आए तब राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान के वरीय चिकित्सक के पर्यवेक्षण में हृदय चिकित्सा के आवश्यक मौलिक टेस्ट कराये गए । टेस्ट के सभी रिपोर्ट स्वास्थ्य के लिए उत्तम व स्थापित मानक के अनुकूल रहे  तथा टीएमटी में कतिपय अवलोकन के सन्दर्भ में मुझे बताया यह गया कि मेडिकल साइंस की भाषा में यह न केवल उलेख्य नहीं है, अपितु इसके निमित्त कोई चिकित्सा व औषधि भी अनिवार्य नहीं है । समुचित जीवन चर्या ही पर्याप्त है ।

चेतना शुन्यता की आवृत्ति समय के साथ बढ़ती ही गई, और महिने, पखवाड़े में कभी कभार होने वाली अनुभूति लगभग दैनिक सी हो गई । जिउतिया व्रत के दूसरे दिन जब वह 
उपवास व प्रात: हुए वमन के कारण क्लांत थीं , मैं बार बार असहजता अनुभव कर रहा था । उन्होंने अगले दिन के लिए न्युरो-चिकित्सक से मिलने का समय निश्चित कर लिया । 
रात्रि में मैं सो नहीं पाया । विस्तर से बार बार उठकर कमरे में ही टहलकर  सहज होने का अभ्यास करता । दिल्ली  से यात्रा के कारण मैं पृथक कमरे में था । बाजु वाले कमरे से वह मुझे शांत होकर सो जाने की सान्त्वना दे रहीं थीं । जब भोर हो गई, मैनें सोचा अब सुबह की कार्यतालिका को क्यों बिगाड़ना?
नित्य निवृत्ति के पश्चात मैं प्रातः भ्रमण के निमित्त निकल पड़ा । लौटकर योगासन- प्राणायाम के लिए नियत स्थान पर बैठने की तैयारी कर ही रहा था कि बरामदे में मैं अचानक अचेत होकर बुरी तरह से            गिर पड़ा । वह हल्की निंद में थीं तथापि जोरों की आवाज से वह घबड़ाकर दौड़ीं, प्रथम तल्ले में सो रहे बेटे वैभव को पुकारा । दोनों ने मिलकर मझे उठाया तथा विस्तर पर लिटाया । उसने दौड़कर छत पर प्राणायाम कर रहे नाना जी को बुलाया, तुरंत सभी परिजन इकठ्ठे हो गए । मुझे होश आ चुका था । सिर के पृष्टभाग में  जोर से चोट लगी थी, तथा वहां कम्प्यूटर के माउस के समान उभार हो गया था । दोनों हाथों में जोरों की पीड़ा थी। बुलाये गए पारिवारिक कम्पाउंडर ने प्राथमिक उपचार के पश्चात मुझे एक अन्य
न्यूरो चिकित्सक के पास ले जाने का परामर्श किया । अगले कुछ घंटे मेरे लिए काफी वेदनापूर्ण थे, मुझे बार-बार अचेत होने के झटके आ रहे थे । 

उचित समय पर हमलोग क्लिनिक पहुंच चुके थे । डाक्टर के नाम का उल्लेख मैं आवश्यक नहीं समझता । कतिपय विलंब के पश्चात उन्होंने मुझे दखने की अनुकम्पा की ।
एक उच्च शक्ति इंजेक्सन के पश्चात अचेत होने के झटके की आवृत्ति कम  होती गई । बाद में उन्होंने दर्द निवारक इंजेक्शन भी दिए । सीटीस्कैन तथा कतिपय रक्तजांच के रिपोर्ट के साथ  शाम को मिलने का परामर्श किया । दोनो जांच के पश्चात उचित समय पर हमलोग पुनः उपस्थित हुए  । दोनों रिपोर्ट देखकर उन्होंने कहा कि न्यरो की दृष्टि से इन्हें कोई समस्या नहीं है,तथा प्रतिप्रश्न किया कि इनके हर्ट की मेडिसिन क्यों नहीं चल रही है? उन्होंने कुछ मेडिसिन लिखा तथा यथाशीघ्र हृदय चिकित्सा  विशेषज्ञ  से मिलने का परामर्श किया ।

हमें राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान के हृदय चिकित्सा केन्द्र के विभागाध्यक्ष महोदय से उनके प्राइवेट क्लिनिक में  मिलने का समय अविलंब मिल गया । कार्डियोलोजी के  होल्टर जांच में हृदय के 24 घंटे के माइक्रोफंक्शनिंग के निरीक्षण के पश्चात उन्होंने यह निर्धारित किया कि हृदय में रक्त संचार की प्रक्रिया बिल्कुल ठीक है किन्तु हर्टबिट के लिए विद्युत ऊर्जा की आपूर्ति में कुछ सेकंड का अवरोध दृष्टिगोचर है । यह क्यों है? इसकी कोई व्याख्या नहीं है । इस विद्युतऊर्जा के सतत आपूर्ति की सुनिश्चितता के लिए पेसमेकर डिवाइस के प्रत्यारोपण की अपरिहार्यता है और इसका कोई विकल्प नहीं है । हमें सोच विचार करने का पर्याप्त समय दिया गया ।

हमारे गृहसंसद के उच्च सदन मेंं चर्चा का विषय यह था कि पेसमेकर का स्थापन कहां कराया जाय ; वंगलुरू या दिल्ली में या कहीं और ? वैभव वंगलुरू में रहते हैं ही, दिल्ली में हमलोग स्वयं , हमारे पास सभी विकल्प खुले थे । जांच के सभी प्रपत्र यूएस  में रह रहे पुष्कर बाबू को संप्रेषित किए गए ।
एक झलक देखने के पश्चात उन्होंने इसे अपने कालेज के कार्डियोलॉजिस्ट मित्र पीजीआई, लखनऊ में  डाक्टर आशीष को भेज दिया । डाक्टर आशीष ने जांच रिपोर्ट के अध्ययन के तुरंत पश्चात कन्फर्म किया कि  बिल्कुल सही निर्णय है ,पेसमेकर प्रत्यारोपण ही होगा । उन्होंने कहा कि वह डेढ़ हजार से अधिक पेसमेकर लगा चुके हैं , उन्होंने लखनऊ आ जाने का प्रस्ताव दिया, तथा आश्वस्त किया कि वह इसे सर्वोत्तम सुविधा से करा देंगे । पुनः उन्होंने आगे कहा कि उनके एक वरिष्ठ सहयोगी डाक्टर प्रकाश कुमार हैं, जो दो हजार से अधिक पेसमेकर प्रत्यारोपणरो कर चुके  हैं, तथा रिम्स रांची में ही हैं ।
बस क्या था ! "अपने गाँव की खाशी, न मथुरा ना काशी " या आधुनिक भाषा
में कहुँ तो "गृहनगर की विशेषता, न मुंबई ना कोलकता " । सारा निर्णय हो चुका था । उन्होंने तत्क्षण डाक्टर प्रकाश से संवाद किया , सभी प्रपत्र उन्हें सम्प्रेषित कर दिया ।
डाक्टर प्रकाश ने अगले दिन के ही प्रथम शल्यन के लिए शल्यन कक्ष आरक्षित कर दिया तथा शल्यक्रिया के निमित्त शरीर की तैयारी, औषधिलेपन इत्यादि के लिए हमलोगों को तत्क्षण राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान, के कार्डियक मल्टीस्पेशलिटी सेन्टर में बुलवा लिया  ।
"डाक्टर वि. के. तिवारी ? " 
" जी,  नमस्ते सर ! "
" जी , नमस्ते !  हम सब आपकी ही प्रतीक्षा कर ही रहे हैं । "
मुझे अस्पताल का गाउन पहनाया गया तथा शल्यन कर्मियों ने रोमकेश विरेचन तथा बेटाडिन से त्वचाशोधन वगैरह किया । मुझे
अगले दिन सुबह स्नानादि के पश्चात तृतीय तल्ले पर आईसीयू में उपस्थित होने का निर्देश देकर विदा किया ।

 19 सितंबर, रिम्स रांची, कार्डियक मल्टीस्पेशलिटी सेन्टर, आइसीयू । पेसमेकर के प्रत्यारोपण हेतु शल्य-क्रिया की सारी तैयारियां हो चुकी हैं । शल्यन कर्मी मुझे शल्यन कक्ष की ओर ले चल रहे हैं, मुझे शल्यन मेज पर लिटाया जा चुका है, दुर्गा सप्तश्लोकी, शिवस्तुति, श्रीहनुमानचालिसा, श्रीविष्णुसहस्रनाम तथा मंत्रजाप मेरा पूर्ण हो चुका है । डाक्टर साहब का सुभागमन भी हो चुका है । अभिवादन के आदान-प्रदान के पश्चात वह कुशलक्षेम व उत्प्रेरण , के अतिरिक्त विविध वार्तालाप कर रहे हैं । मैं स्वीकृति प्रदान करता रहा हूँ । पूरे शरीर को अचेत नहीं किया गया है । मैं अर्द्ध चेतना में 
हूँ । पहले ऊरुप्रदेश में छेदन फिर हृदय प्रदेश में, सीने व दक्षिण बांह के मध्य मांशल भाग में लघु-शल्यन तथा पेसमेकर का प्रत्यारोपण । आधे-पौन घंटे में प्रक्रिया पूरी हुई ,  मोनेटर पर मुझे एक झलक दिखाया गया । स्टीचिंग व बैंडेज के पश्चात  मुझे आइसीयू विस्तर  क्रमांक 12 पर स्थांंतरित किया जा चुका है।  कड़े इंजेक्शन के वावजूद मुझे बहुत दर्द है , शल्यन स्थल को दो-ढाई किलोग्राम के सैंड-बैग के बल से दबाकर रखा गया है । मैं चेतता में हूं ,फिर भी आस पास की गतिविधियों की समझ मुझे नहीं है । परिवार के लोग मेरे पास  हैं ।
चार घंटे पश्चात रेत का थैला हटा दिया गया , हांथ पांव हिलाने की अनुमति मिली,तथा अन्न-प्रासन्न हुआ । दिनभर की मोनेटरिंग के पश्चात रात्रि में सोने के पूर्व मोनेटर के सभी उपकरण हटा लिए गए । बेटे वैभव व उसकी माता जी रात व दिन की पारियों में सदा मेरे साथ रहे । दूसरे दिन प्रात: तक दर्द समाप्त हो गया । तीन दिन आइसीयू में रहने के पश्चात हमें घर आने की अनुमति मिल गई ।
दो-तीन के अंतराल पर ड्रेसिंग होती रही , दसवें दिन स्टीचिंग हटा दी गई । 

शल्यन के लगभग सवा महीने व्यतीत हो चुके हैं । "वर्षो विगति,शरद् ऋतु ''आ चुकी है । नवरात्र की यज्ञ-धुम्र पर्यावरण को सुरभित कर रहे हैं। पर्याप्त विश्राम के पश्चात मैं पुनः पूर्ण स्वस्थ व ऊर्जावान होकर, अपने शोध-अध्ययन , लेखन व अध्यापन कार्य से जुड़ चुका हूँ ।

पेसमेकर मेरा वन्धु व सखा बन चुका है । सचमुच पेसमेकर से मित्रता हो गई है मुझे ।
शिकागो मैनुअल के अनुसार कृतज्ञता ज्ञापन
पुस्तकों के आरंभिक पृष्ठों में होता है, यद्यपि इसका लेखन पुस्तक के समापन तथा प्रकाशन के ठीक पहले किया जाता है। इसी परंपरा का निर्वाह मैं स्वांतःसुखाय लिखे गए इस संस्मरण में कर रहा हूँ । प्रथम प्रणाम के अधिकारी तो निश्चय ही ईश्वर है , क्योंकि हानि-लाभ,जीवन-मरन, यश-अपयश सब तो  उन्हीं के हाथ है । उनके अतिरिक्त कोई मेरा आभार स्वीकार करने को तैयार नहीं है । अल्पना रानी , भार्या की भूमिका से उपर उठकर माता-पिता की भूमिकाएं भी की । "धीरज,धर्म, मित्र अरु, नारी। आपतकाल परखिए चारी ।" इस आर्ष -वाक्य को उन्होंने अपने जीवन रुपी प्रयोगशाला में अभिप्रमाणित कर दिया है । बालक वैभव अब अपनी सौम्यता में भी बड़े हो गए हैं । वह अहर्निश अभिभावक की भूमिका में रहे । मेरे महान पिता वीर पुरुष रहे हैं , तथापि दैन्य दशा में पहली बार मुझे देखकर उनकी आखें छलक गईं, वह बोले, "यह क्या हो गया ? "ऐसा तो कभी होता नहीं था । " मैंने कहा, "बाबुजी कुछ हुआ ही नहीं , इसमें शोक का कोई कारण ही नहीं  है।" फिर उन्होंने लगभग 25वर्ष पूर्व हुए पथरी के अपने बड़े शल्यन का उल्लेख कर मुझे संबल प्रदान किया । प्रणिपात करता हूँ । धर्मपिता श्वसुर जी तथा अनिवासी भारतीय भ्राता महोदय की विशालहृदयता का कैसे आख्यान करुं ! उन्होंने बिना यह पता किए कि, इस निमित्त धन उपलब्ध है या नहीं,  ब्लैंक चेक्स दकर वैभव को यह निर्देश दिया कि सभी बड़ा भुगतान वह इसी से करे ।  प्रिय भाई सुशील हरघड़ी साथ रहकर हंसते और हंसाते रहे । डाक्टर अरविंद भइया ने पेसमेकर की फोबिया को हटाटर आत्मविश्वास भरा । गांव से प्रो० निर्मल भइया, प्रिय दिलीप, सतीश, किशोर, कुलबुल सभी अद्यतन समाचार के लिए सदैव संवाद करते रहे । दिल्ली से आनन्द, रानी , कल्याण, स्वाति , युएस से अनामिका , रश्मि , रांची में लता, लल्ली, रेणु, राकेश, आकाश, विकास, सुरेंद्र, आशीष, संतोष इत्यादि सबने मेरे शीघ्र स्वस्थ होने पर हर्ष प्रकट किया । मुख्य शल्य चिकित्सक महोदय तथा उनके टीम के सभी स्वास्थ्यकर्मियों के प्रति मैं विनयपूर्वक कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ ।

"पेसमेकर से मित्रता" संस्मरण का शीर्षक मैंने पंचतंंत्र से लिया है । हमारे शास्त्रों में मित्रता के सन्दर्भ भरे पड़े हैं। "दिनस्यपूर्वार्द्वअपरार्द्ध भिन्न:, छाएवमैत्री खलुसज्जनानाम", महाराज भर्तृहरि कहते हैं कि दुष्ट जनों की मित्रता प्रातःकाल की छाया की भांति पहले तो बहुत लंबी, फिर मध्याह्न में समाप्त हो जाती है, किन्तु भद्र जनों की मित्रता अपरान्ह की छाया की भांति पहले तो बहुत छोटी , फिर सुदीर्घतम हो जाती है । पेसमेकर से मेरी मित्रता मेरी जीवन प्रत्याशा को सुदीर्घता प्रदान करे, ऐसी विनती है ।




 

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