Gandhi Geeta Foundation
Sunday, 25 October 2020
राजमणि तिवारी : अब केवल स्मृति शेष
Friday, 23 October 2020
पेसमेकर से मित्रता
Thursday, 8 October 2020
रजवाडीह : मेरे बचपन की काशी 1
# डा० विनोद कुमार तिवारी #
पलामूं जिला मुख्यालय से हजारीबाग मार्ग पर सातवें किलोमीटर का ड्राइव । पान, चाय- चौपालों पर संंसदनुमा राजनैतिक बंहस, कोई भाजपा प्रवक्ता के रुप में यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऐतिहासिक निर्णयों की वकालत कर रह हो,अथवा कोई कांग्रेस प्रवक्ता के रुप मे धूर्तता पूर्वक उसका खंडन कर रहा हो, तो समझ लिजिए आप रजवाडीह की धरितृ
पर खड़ें हैं ।
यद्यपि राजनैतिक परिचर्चा यहां की मूल प्रकृति नहीं है ,यह तो देश, काल जन्य है । रजवाडीह की पहचान रामायण व आध्यात्म की परिचर्चा व गायन है जिसे यहां की युवा पीढ़ी ने अपने महान पूर्वजों से थाती के रुप मे प्राप्त किया है ।
जब आप अपने सोफ्टवेयर मे "रजवाडीह'' लिखें और आपके सहयोग के निमित्त गुगल अंकल जो समानधन्यात्मक शव्द संकेत करते हैं, उनमें 'रजवाड़े' एक महत्वपूर्ण विकल्प है।
कहते हैं कि स्वतंत्रता के समय हमारे देश में लगभग छे सौ स्टेट्स , रजवाड़े थे । अब रजवाडीह उन रजवाड़ों मे सम्मिलित था या नहीं, यह शोध का विषय हो सकता है , किन्तु मैं समझता हूँ यहां के भद्रलोक की जीवन शैली किसी रजवाड़े से कम नहीं है ।
कहते हैं कि यहां सर्वसम्मानित पान्डयों का परिवार "महतो घराना'' कहलाता है। यह 'महतो' कोई जातिवाचक संज्ञा नहीं अपितु सम्मान बोधक है,जो सैकड़ों वर्ष पूर्व ब्रिटिश शासकों द्वारा इन्हें प्राप्त हुआ । मैंने बड़ी उत्सुकता से महतो शब्द की ब्युत्पति का अध्ययन किया । मैंने पाया कि यह संस्कृत के 'महत्' से ब्युत्पन्न है ,जो हमारे शास्त्रों में 'महान' व महत्वपूर्ण' के अर्थ में पुनः पुनः प्रयुक्त हुआ है, यथा देखिए बाल्मीकि रामायण :
"काव्ये रामायणम कृष्टम सीतायाः चरितम महत्" । 2 अर्थात "रामायण महाकाव्य में सीता का चरित्र बहुत महान है।"
यहाँ यह कहना अप्रसांगिक नहीं है कि स्वयं ''पान्डेय'' शब्द जो सम्प्रति ब्राह्मणों में एक श्रेष्ठ कुल के अर्थ में रुढ़ हो गया है भी "कुलीनता" व "पांडित्य" का बोधक ही है। उत्तर प्रदेश के कई अंचलों में श्रेण्य कायस्थ कुलों में अपने नाम के पूर्व गर्वपूर्वक 'पान्डेय' लिखने की परिपाटी है । हरिवंशराय बच्चन ने अपनी "मधुशाला" की प्रस्तावना मे लिखा है कि उनका परिवार 'पान्डेय' कहलाता है ,तथा उनके पूर्वजों ने कभी मांस-मदिरा का स्पर्श तक नहीं किया । 3
बच्चन को यह हलफनामा इसलिए देना पड़ा क्योंकि मधुशाला के लोकप्रिय होने के पश्चात महात्मा गांधी के पास यह शिकायत की गई कि बच्चन तो मधिरा पान को गौरवान्वित कर रहा है । बच्चन ने गांधी को आश्वस्त किया कि यह आरोप सत्य नहीं है तथा यहाँ हालावाद के प्रतिमानों के आलोक में मानवीय प्रवृत्तियों पर टिप्पणी की गई है ।
रजवाडीह के पान्डेयों के इसी महान कुल में अब से लगभग सार्द्धशती वर्ष पूर्व एक महान मनीषि श्री वाणीराम पान्डेय का जन्म हुआ ।
कहते हैं कि बालक के जन्म के अविलंब पश्चात उसकी वाणी(श्रीमुख) से "राम" शब्द
उच्चारित हुआ। धर्मात्मा पिता श्रीमान बुटूराम पान्डेय जी अभिभूत हुए और बच्चे का नाम रखा वाणीराम पान्डेय ।
वाणीराम पान्डेय पांच यशस्वी पुत्रों के पिता
हुए: श्री परमानंद पान्डेय, श्री महादेव पान्डेय, श्री महावीर पान्डेय, श्री देवनन्दन पान्डेय तथा श्री सूर्यदेव पान्डेय । पान्डेयों के इस श्रेण्य कुल से मेरे बड़े आत्मीय सम्बन्ध हैं । यह मेरा मातृकुल है, और इस मातृऋण से अनुप्राणित होकर ही मैंने यह शोध आलेख लिखने को प्रेरित हुआ । (यह शोधआलेख भविष्य में प्रकाशित मेरी संस्मरणात्मक पुस्तक का एक अध्याय है।)
मेरी महान माता श्रीमती कमला देवी (दिवंगता) श्री वाणीराम पान्डेय के कनिष्ठ पुत्र श्री सूर्यदेव पान्डेय की द्वितीयात्मजा थीं । अतएव ये सभी भाई मेरे नाना तथा वाणीराम पान्डेय जी मेरे प्रनाना हुए । श्री परमानन्द पान्डेय जी तथा सूर्यदेव पान्डेय जी क्रमशः जेष्ठ व कनिष्ट भ्राता पलामू के प्रसिद्ध अध्यापकों में रहे , आज भी जपला तथा अन्य अंचलों मे उनके पढ़ाए सैकडों शिष्य मिलेंगे । श्री परमानन्द पान्डेय जी गणित के श्रेण्य ज्ञानी थे, अंकगणितीय के क्लिष्ट पश्नों का हल उनकी ऊंगलियों पर होता तथा इसके समाधान का सूत्र की काव्यात्मक ब्याख्या उनके श्रीमुख पर । यह विडंबना है कि ऐसा अध्यापन उस पीढ़ी के साथ ही विलुप्त हो गया तथा आधुनिक बच्चों की प्रतिभा मोबाइल तथा कैलकुलेटरों के प्रति आसक्त होकर कुंठित सी हो रही है।
श्री महादेव पान्डेयजी शिव व कृष्ण की परंपरा में पर्यावरण, गौपालन तथा कृषिविशेषज्ञ थे । श्री महावीर पान्डेय जी संतप्रवृति के यायावर थे । श्री देवनन्दन पान्डेय जी भारतीय सेना में अधिकारी थे । स्वाभाविक है उनका व्यक्तित्व
नारिकेल फल के समान दृढ़ था , किन्तु उनका हृदय नवनीत के समान कोमल ।
श्री सूर्यदेव पान्डेय जी से मैंने समाज व गृहोपयोगी वस्तुएं बनाने के दर्जनों कौशल सिखा है । सभी नानाओं को दिवंगत हुए कई दशक ब्यतीत हो चुके हैंं और यह संस्मरण मैं लगभग अर्द्ध शताब्दी पूर्व की स्मृतियों के आधार पर लिख रहा हूँ और अबतक गंगाजी में असीम जल प्रवाहित हो चुका है ।
पांच नानाओं के बीच लगभग दर्जन भर मामाओं की श्रृखंला : श्री संजय कुमार पांडेय(दिवंगत), श्री शिव कुमार पान्डेय (दिवंगत), श्री राधाकृष्ण पान्डेय, श्री भूषण कुमार पान्डेय, श्री रमेश कुमार पांडेय, श्री अवधेश कुमार पान्डेय,श्री मदन कुमार पान्डेय , श्री अखिलेश्वर पान्डेय , श्री मुरलीधर पान्डेय, श्री जनार्दन पान्डेय (दिवंगत), श्री रतन कुमार पान्डेय । सभी तेजस्वी, सभी यशस्वी ।
जर्मन दार्शनिक प्रोफेसर फ्रेडरिक मैक्समूलर ने लिखा है, "हे ईश्वर ! हमारा अगला जन्म भारतवर्ष मे हो, और उस परिवार में जहाँ लोग देववाणी संस्कृत में संभाषण व वार्तालाप करते हों।" 4 संस्कृत में संभाषण कैसे संभव है ,यदि इस निमित्त उचित शिक्षण व प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं हो । श्री संजय कुमार पान्डेय ने इस महती आवश्यकता को समझा तथा इस निमित्त अपनी भूमि दान कर संस्कृत शिक्षण संस्थान की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया ।
श्री रतन कुमार पान्डेय इस संस्कृत विद्यालय के स्वप्नद्रष्टा रहे तथा आजीवन इस संस्था का संवर्धन किया । यह हर्ष का विषय है कि हमारी सरकार ने देश में तीन संस्कृत विश्वविद्यालयों की स्थापना का विधेयक संसद में पास कर दिया है । रजवाडीह का यह संस्कृत विद्यालय यदि इन किसी भी विश्वविद्यालय से संबद्धता प्राप्त कर लिया तो यह पलामुं ही नहीं, अपितु यह सम्पूर्ण झारखंड व विहार का महत्वपूर्ण संस्कृत शिक्षण संस्थान बन सकता है ।
श्री शिव कुमार पांडेय उच्च विद्यालय लेस्लीगंज में अंगरेजी के आचार्य तथा पुनः प्राचार्य रहे । सम्प्रति अंगरेजी शिक्षण के कार्यशालाओं मे मुझे विषय विशेषज्ञ (Resource Person) के रुप में आमंत्रित किया जाता है, किन्तु बड़ी विनम्रपूर्वक कहना है कि अंगरेजी लेखन कौशल की विद्यालयीय शिक्षा मैंने श्री शिवकुमार पान्डेय जी से प्राप्त की । इस प्रकार वह मेरे मामा तथा अध्यापक की युगल भूमिका मे रहे । श्री अवधेश कुमार पान्डेय सैनिक बलों के कमांडेंट के रुप में देश के दर्जनों मुख्यालयों पर पदस्थापित रहे तथा देश को गौरवान्वित किया ।
सद्यदिवंगता सुशमा स्वराज जी श्रद्धांजलि सभा में मैंने लौर्ड वायरन की एक पंक्ति उद्धृत की "औफ हूम द गौड लव्स डाइ यंग" 5 अर्थात अति मानवीय गुणों के कारण ईश्वर जिन्हें बहुत प्यार करता है, वे समय पूर्व ही ईश्वर के प्यारे हो जाते हैं। वायरन की ये पंक्तियाँ श्री जनार्दन पान्डेय जी के सन्दर्भ में पूर्णत: चरितार्थ हैं । अप्रतिम मेधाशक्ति, प्रफुल्लित मुखमण्डल , एक एक शब्द से विनम्रता की अभिव्यक्ति । विनयावनत हूँ मैं । श्री भूषण कुमार पान्डेय, श्री अखिलेश कुमार पांडेय, श्री मुरलीधर पान्डेय, श्री मदन कुमार पान्डेय , श्री रमेश कुमार पांडेय इत्यादि सबके व्यक्तित्व में सरलता व गरिमा का सहज समाहार पढ़ा जा सकता है।
मामाओं के कीर्ति गायन के पश्चात यदि मामियों का चरित चित्रण नहीं हो, तो यह गाथा पूर्णता को कैसे प्राप्त कर सकता है ।
सभी सुगढ़ ,सभी सुशील, सभी सुसंस्कृत ।
बचपन में अपनी माता-पिता के साथ या बाद मे अकेले भी जब हम रजवाडीह आते , हमारे आगमन का समाचार अतिशीघ्र सर्वत्र प्रसारित हो जाता, आबालवृद्धनरनारी तीन पीढ़ियों का एकत्रीकरण हमारे स्वागत में, सबके मन में उल्लास । द्वार पर पन्ढार दिया जाता, फिर उचित आसन प्रदान के पश्चात मामियों की मंडली , कठौते के जल में पांव प्रक्षालन, फिर अंगोछे से प्रेमपूर्वक पांव पोंछकर आंचल के पल्लू को युगल हाथों मे लेकर पांव छुकर पंचप्रणाम करने के निमित्त अपनी पारी की प्रतीक्षा । विश्वविद्यालय के दिनों तक मैं इस पंचप्रणाम की सविनय अवज्ञा करता तथा अपने सांघिक प्रभाव मे इसके बदले हाथ जोड़कर नमस्ते करने का आग्रह करता । वे
हंहते हुए कहतीं, "विनोद बाबु ! रउवा भगिना ब्राह्मण ही । रउवा आशीर्वाद दिहूं । राउर आशीर्वाद से हमनी फलब फूलब ।" मेरे पास हाथ जोड़कर मन ही मन "एवमस्तु" कहने के अतिरिक्त कोई विकल्प ही नहीं होता ।
दशकों पूर्व की स्मृतियां हैं ये । अब एक विचारक (idealogue) के रुप मैं यह समझता हूँ कि अतिथियों के आवभगत की यह परंपरा हमारी महान भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है,जिसे न केवल संजोए रखने की आवश्यकता है अपितु समस्त विश्व में इसे प्रसारित करने का हमारा दायित्व भी है । रामायण कथा मे केवट द्वारा भगवान राम का पाद् प्रक्षालन तथा महाभारत में धर्मराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में भगवान कृष्ण द्वारा आगत अतिथियों का अभिनन्दन इसी परंपरा का समष्टिकरण है ।
श्री राधाकृष्ण पान्डेय सम्प्रति इस कुल में सर्वाधिक वरीष्ठ युवा हैं । आपके महान व्यक्तित्व का चित्रण करते हुए मैं गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की एक एक सुंदर पंक्ति गुणगुना रहा हूँ जो उन्होंने प्रभू श्री राम से अपने सम्बन्धों के सन्दर्भ में लिखी है:
"तोहे मोही नाते अनेक मानिए जो भाए "6
आपकी उम्र मात्र तीस वर्ष है इसके अतिरिक्त आपको लगभग साठ वर्षों का सुदीर्घ अनुभव है । आपका पावन परिणय अब से लगभग साढ़े सात दशक पूर्व मेरी बुआ श्रीमती मुखपति दवी (सुपुत्री पंडित श्री बुद्धनंन्दन तिवारी जी, सुपौत्री पंडित श्री प्राणराम तिवारी जी, ग्राम जामुन्डीह, पलामूं ) के साथ हुआ ।
अतएव आप हमारे प्रिय फूफा जी हैं, और हैं श्री वाणीराम पान्डेय एवं श्री प्राणराम तिवारी
दो महान कुलों के बीच सेतुबंध रामेश्वरम । सम्प्रति आपके चरणों पर दोनो घरानों के सभी जनों के मस्तक नत होते हैं । मेरी बुआ अभी कुछ वर्ष पूर्व दिवंगता हो चुकी है तथापि आपके व्यक्तित्व के बड़प्पन मे चीर सातत्य है । मुखमंडल पर प्रसन्नता, वाणी में मधुरता, व्यवहार में विनम्रता, हृदय में उदारता और दृष्टिकोण में विशालता आपके व्यक्तित्व के आभूषण रहे हैं । मैंने आपकी ऊंगलियों को पकड़कर चला भी है और सम्प्रति आपके पांव कहीं उपर नीचे न पड़ जायं इस निमित्त आपके हाथ पकड़कर आपको चलाता हूं । साष्टांग प्राणिपात ।
दर्शन भर मामाओं के बीच लगभग तीन दर्जन मेरे ममेरे भाई बहन । सभी सभ्रांत व उच्च मानवीय मूल्यों के प्रतिमान । बहनें लगभग सभी अब अपनी-अपनी श्वसुर कुलों की राजमहिषी बन चुकीं हैं । सबकों मंगलकामनाएं हैं मेरी ।
भाइयों व भतीजों में कई उच्च पदस्थ सरकारी सेवाओं में, तो कई समाज सेवा में अपने कुलीन व्यक्तित्व की सुरभि बिखेर रहे हैं । मेरे कई भाई अध्यापक, कई अघिवक्ता और लगभग आधे दर्जन भारतीय सैनिक के रुप में देश सेवा कर रहे हैं । मैं अपने सभी भाइयों सर्वश्री उमाशंकर पान्डेय (अधिवक्ता), श्री गोविन्द कुमार पान्डेय (समाज सेवा), श्री रघुवंश मणि पान्डेय (बैंक अधिकारी), श्री राजीव रंजन पान्डेय (भारतीय डाक सेवा)श्री सत्यवान कुमार पान्डेय(अध्यापक),श्री सत्यनारायण पान्डेय,(अध्यापक)श्री दीपक कुमार पांडेय (समाज सेवा) , श्री अनिल कुमार पांडेय, श्री सुशील कुमार पांडेय, श्री अजय कुमार पांडेय, श्री आलोक कुमार पांडेय, श्री आनंदराज पान्डेय (भारतीय सेना) श्री आशीष कुमार पान्डेय, (भारतीय सेना) श्री प्रभात रंजन पान्डेय, श्री सुधीर रंजन पान्डेय, श्री ब्रजेश रंजन पान्डे(अधिवक्ता सर्वोच्च न्यायालय) श्री चिंतामणी पान्डेय (बैंक अधिकारी) ,श्री चन्द्रमणी पान्डेय, श्री श्रीकांत पान्डेय, श्री शशांक शेखर पान्डेय,
श्री संतोष कुमार पांडेय (अध्यापक), श्री गौरव कुमार पान्डेय, श्री अगस्त कुमार पान्डेय, श्री विकास कुमार पान्डेय को अभिनन्दन व उज्जवल भविष्य की मंगलकामनाएं सम्प्रेषित करता हूँ ।
भाइयों के पश्चात सभी भतीजों को भी मैं हार्दिक शुभकामनाएं अर्पित करता हूँ ।
डा० समीर कुमार पांडेय (गणित के प्राध्यापक, केन्द्रीय विश्वविद्यालय),अमित कुमार पांडेय, (अध्यापक), आशुतोष कुमार पांडेय (सम्पादक, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया),
प्रशांत कुमार पांडेय (झारखंड पूलिस सेवा), उज्जवल कुमार पांडेय (झारखंड पुलिस पदाधिकारी), राकेश कुमार पांडेय, प्रेम कमल पान्डेय, राजकमल पान्डेय (भारतीय तिब्बत सीमा सुरक्षा बल), ऋषभ(भावीअध्यापक) सौरभ,विराट, सृजन, कार्तिकेय, राजशेखर, शुभांकर, आयुष, सुधांशु, शुभम, अंकित रंजन, अंकुर रंजन, सामंत, हेमंत, नमन, अनमोल, हिमांशु, हर्ष, यश, कृश , प्राशु, श्रेयश, आर्यन, मयंक राज, रुद्रराज इत्यादि तथा पौत्रगण यथा अभिनव, अर्णव, आद्वीक, अनुभव उत्कर्ष, अव्यांश, तथा ऋत्विक सबको
मेरा आशीर्वचन है । मै कामना करता हूँ कि आप सब अपने जीवन में चरम उत्कर्ष को प्राप्त करें ।
अपने भाइयों, भतीजों और पौत्रों के सम्मान और शुभेच्छा में मैं भारतीय आंग्ल कवि श्रीमान हरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय की सुन्दर पंक्तियाँ उद्धत करता हूँ :
"Since we are in love with quest,
We are friend of mountain tops,
In movement alone is rest,
Unbeatable when it stop." 7
इन सुन्दर पंक्तियाँ का सुन्दर पद्यानुवाद जो मैंने स्वयं किया है को उद्धृत करना भी यहां उपयुक्त ही है :
"हम अनंत के अन्वेशी हों,
प्रिय हों हमको शैल शिखर ,
गति मे ही सिर्फ यति स्थित,
रुक जाना ही सबसे दुश्वर ।" 8
रजवाडीह की सुबह अब से तीस चालिस वर्ष पहले काशी के "सुबहे बनारस" से कम रंगीन नहीं होती थी । आबालवृद्धनरनारियों का भैसाखुर को प्रस्थान । पहले प्रवाहित जलाशय में स्नान फिर भगवान शिव का जलाभिषेक:
"नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम्
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिरा
ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्
करालं महाकाल कालं कृपालं
गुणागार संसारपारं नतोऽहम् " 9
+++ +++ +++
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेवलम्ब्यलम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिवो शिवम् ॥ 10
मंदिर में घंटा- वादन, धुम्र-आरती, तथ शंख- ध्वनि से सम्पूर्ण वातावरण पवित्र हो जाता ।
रजवाडीह के लोगों ने भैसाखुर को पलामू के प्रसिद्ध तीर्थ के रुम में विकसित किया;
पहले शिव मंदिर, फिर भव्य दुर्गा मन्दिर, सभामंडप, तरण ताल , मुख्य मार्ग से पहुंचपथ
सब सुन्दर, प्रशंसनीय । भैसाखुर के डगर को रजवाडीह के भद्रलोक के आगमन का इंतजार आज भी है ।
रजवाडीह का सामाजिक सौहार्द हारमोनियम के सात सुरों के समान सुमधुर है । मैं समझता हूँ कि गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की सुन्दर पंक्तियाँ "सब नर करहीं परस्पर प्रीति" जो उन्होंने अयोध्या की समाज व्यवस्था का वर्णन करते हुए लिखा है, रजवाडीह के सामाजिक जीवन के सन्दर्भ में सम्पूर्णत:
सत्य हैं । मैने कई सामाजिक समारोहों में ब्राह्मणेत्तर वन्धुओं के यहां प्रेमपूर्वक अन्नप्राशन किया है । एक बार नई दिल्ली से रांची की यात्रा के क्रम में सामने वाले बर्थ पर यात्रा कर रहे जैतुखाड़ के एक परिवार से सानिध्य हुआ । वह केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल मे इन्स्पेक्टर थे,तथा जम्मू कश्मीर के रजौरी जिले मे पदस्थापित थे। जैतुखाड़ जो रजवाडीह का एक पड़ोसी ग्राम है जहां की लगभग शत प्रतिशत आबादी दलित दुशाध्य वन्धुओं की है । उन्होंने मेरे मामाओं व भाइयों का नाम बड़ी सम्मान व कृतज्ञता पूर्वक लिया । अतएव बिना किसी सन्देह के यह तथ्य स्थापित किया जा सकता है कि कौमरेड मित्रों ने जो भ्रांतियां फैलायीं हैं कि ब्राह्मणों ने दलितों का शोषण व आत्याचार किया है, यह सम्पूर्णत: मिथ्या अवधारणा (absolutely false narrative) है ।
रजवाडीह मे सम्प्रति आधा दर्जन देवस्थानम
हैं । मुझे बताया गया है सप्तमातृकाओं के प्राचीन मंदिर में छागशिशु बली की अंधपरंपरा वैष्णव पूजा में लगभग प्रत्यास्थापित हो गई है । वासंन्तिक नवरात्र की मांगलिक परिवेला में महावीर मन्दिर प्रांगण में आयोजित श्री रामचरित मानस नवान्हपारायण यज्ञ यहाँ सर्वाधिक भब्य सांस्कृतिक अनुष्ठान है । श्री
महावीर मंदिर प्रांगण सांस्कृतिक राष्ट्रवाद (Power House of Renaissance of Cultural Nationalism) के नवजागरण के ऊर्जाकेन्द्र के रूप मे विकसित हुआ है। श्री हनुमानजी महाराज का व्यक्तित्व बहुआयामी है । वे अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं तो हैं ही, वे ज्ञानिनामअग्रगण्यम् भी है । प्रभुचरितसुनिवेकोरसिया उनकी प्रवृत्ति है, और जहां प्रभु श्री राम के चरित का गायन होगा, सर्वत्र ऋद्घि-सिद्घि की अभिवृद्धि तो होगी ही, भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भी अपने परमवैभवंतेतुमेततस्वराष्ट्म को प्राप्त होगा , क्योंकि मर्यादा पुरुषोत्तम राम के पावन चरितगाथा मे भारतीय राष्ट्रीयता की ही तो अभिव्यक्ति हुई है । हिन्दी की सुन्दर काव्य पंक्तियों से मैं अपने आलेख का उपसंहार करता हूँ:
जब पंचवटी में कोई भी रावन घुस आया करता है,
भारत बन करके राम तभी कोदंड उठाया करता है ।
चल पड़ती युवकों की सेना पापी लंका सुलगाने को,
कोई भी रावण शेष नहीं रह जाता सिया चुराने को । 11
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सन्दर्भ:
1. आलेख का शीर्षक स्वामी विवेकानंद के भारत में दिए व्याख्यान से लिया गया है ।
2. 1/4/7 महर्षि वाल्मीकि विरचितम रामायणम, गीता प्रेस, गोरखपुर, भारत )
3. प्रस्तावना, मधुशाला, हरिवंशराय बच्चन, राजपाल एन्ड संस, नई दिल्ली
4. Complete Works of Prof. Fredrick Maxmuller, London
5. Lord Byron, Winged Word by David Green, London.
6. कवितावली, गोस्वामी तुलसीदास, गीताप्रेस, गोरखपुर
7. हरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय, सरोजिनी नायडू के भाई हैं , तथा भारतीय आंग्ल काव्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं ।
8. काव्यानुवाद, डा० विनोद कुमार तिवारी
9 . शिवस्तुति, रामचरितमानस, गोस्वामी तुलसीदास, गीताप्रेस,
10. शिवतांडवस्तोत्र, स्तोत्ररत्नावली, गीताप्रेस, गोरखपुर
11 .श्री अटल बिहारी वाजपेयी, जागृति कके स्वर, लोकहित प्रकाशन, लखनऊ
टिप्पणी : यह आलेख मेरे ब्लॉग gandhigeetafoundation पर भी पढ़ा जा सकता है ।)
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Wednesday, 19 December 2018
मृतकों में नव जीवन की हुंकार भरें हम
अभी अभी श्रीमन्त अटल बिहारी वाजपेयी की शवयात्रा तथा अन्तेष्टि संस्कार में भाग लेकर "राष्ट्रीय स्मृति स्थल"
से लौटा हूँ। रात मे गांव से एक भाई का सन्देश आया । उन्होंने बड़े आग्रह पूर्वक कहा, " चूँकि इतने कम समय मे हमलोग अटल जी के अंतिम संस्कार में भाग लेने दिल्ली नही पहुंच सकते, आप वहां हैं , अतः संस्कार मे भाग लेकर आप हमारे कुल-गोत्र -ग्राम-शहर का प्रतिनिधित्व करें" । मैं भावविह्वल हो गया । मैंने उन्हें आश्वासन दिया, "मैं ऐसा अवश्य करूँगा " फिर भार्या महोदया ने भी अंतिम दर्शन की इच्छा प्रकट की, मैंने मौन सहमति दी ।
हमलोग बड़े सवेरे अपने प्रिय अटल जी के घर 6ए,कृष्ण मेनन मार्ग पहूंच गए। बड़ी भीड़ के वावजूद हमने आराम से उनके अन्तिम दर्शन किया तथा चरणों मे श्रद्धासुमन अर्पित किया। परिसर मे माननीय सेनाध्यक्ष , तीनों सेनाओं के अगणित शीर्ष अधिकारियों , श्रेण्य गण्यमान्य जनों से प्रत्यक्ष मिलन हुआ । किशोरवय से ही अटल जी की कविताओं के उद्याम पाठ करने की दिवानगी रही है...
"आज सिन्धु में ज्वार उठा है,नगपति फिर ललकारउठा है ,
कुरुक्षेत्र के कण - कण से, फिर पाँचजण्य फूंकार उठा है,
अगणित आघातों को सहकर , जीवित हिन्दुस्थान हमारा ,
जग के मस्तक पर रोली सा , शोभित हिन्दुस्थान हमारा ।" +++ +++ +++ "जगकोकलसअमृत का देकर,हमनेविषकापानकियाथा,
मानवता के लिये हर्ष से अस्थि - वज्र का दान दिया था। "जबपश्चिमने वनफल खाकर, छाल पहनकरलाजबचायी, तब भारत से सामगान का , स्वर्णिम स्वर था दिया सुनाई ,"
गणमान्य जनो के बीच उनकी कविताओं की चर्चा चली , तो मुझसे इन्हें प्रस्तुत करने का आग्रह किया गया । मैंने उनकी दो तीन कविताओं का पाठ किया । लोग बड़े उत्साह मे थे। कुछ लोगों ने मेरे पांव छुने का यत्न किया, मैंने गले लगाकर उनका अभिवादन स्वीकार किया।
इसी बीच आकाशवाणी केंद्र से बुलावा आ गया । विदेशी प्रसारण सेवा ने अटलजी की राष्ट्रीय कविताओं के पाठ का आयोजन किया था। यह दूसरा अवसर था, जब मैंने अपने मेँटर श्रीमन्त अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं का पाठ किसी प्रतिष्ठित. मंच से किया। लगभग एक दशक
पूर्व राँची मे माननीय बलवीर दत्त जी नेअटलजी की जयंती के उपलक्ष्य मे राँची एक्सप्रेस के एक विशेष आयोजन मे मुझसे उनकी कविताओं का पाठ कराया था:
" अगणित बलिदानों से अर्जित यह स्वतंत्रता ,
अश्रु , श्वेद , शोणित से सिंचित यह स्वतंत्रता,
त्याग , तेज, तपबल से रक्षित यह स्वतंत्रता ,
दुखी मनुजता, के हित अर्पित यह स्वतंत्रता ।
इसे मिटाने की साजिश करनेवालों से,
कह दो, चिनगारी का खेल बुरा होता है,
औरों के घर आग लगाने का जो सपना ,
वह अपने ही घर मे, सदा खरा होता है।
जबतक गंगा मे धार , सिन्धु मे ज्वार ,
अग्नि मे जलन , सूर्य में तपन शेष ,
स्वातंत्र्य समर की वेदी पर अर्पित ,
होंगे अगणित जीवन , यौवन अशेष "
राँची के प्रबुद्ध जनों से भरा विशाल कक्ष तालियों से गूँज रहा था। मुख्य अतिथि माननीय यशवंत सिन्हा जी , विशिष्ट अतिथि श्री शत्रुघ्न सिन्हा जी तथा मुख्यमंत्री श्री अर्जुन मुण्डा जी के करकमलों से सम्मान पत्र प्राप्त करना मेरे लिए अविस्मरणीय क्षण हैं ।
श्रीमन्त वाजपेयी के प्रखर व्यक्तित्व के प्रति मेरा आकर्षण तब हुआ जब चार दशक पूर्व मैं उच्च विद्यालयीय छात्र था। वह हमारे पिताजी तथा काकाजनों के प्रिय वन्धु व सखा "श्री अटलजी " थे । वे सभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनसंघ तथा पुनश्च भारतीय जनता पार्टी के शैशव काल मे श्री गुरुजी, श्री दीनदयाल जी,नाना जी देशमुख, श्री अटल जी प्रभृति मनीषियों से आत्मीय रुप से जुड़े थे। उनलोगो के मुखारविंद से हर अवसर पर अटल जी की यश:चर्चा सुनता था। फिर पिता जी ने राची से एक पुस्तक "जागृति के स्वर" लाकर मुझे दिया। लोकहित प्रकाशन , लखनऊ की इस कृति के प्रस्तावना मे लिखा था " इसमे श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की अधिकतर कविताओं का संकलन किया गया है। " यह वह दौर था जब "मेरी इक्यावन कविताएं " सहित श्री अटल जी की किसी ग्रंथ का औपचारिक प्रकाशन नहीं हो पाया था। सम्प्रति श्रीमन्त वाजपेयी के सम्पूर्ण कृतित्व का प्रकाशन कर वन्धुवर श्री तरुण विजय जी ने राष्ट्र की महती सेवा की है।
"जागृति के स्वर " मे श्री वाजपेयी के राष्ट्र जागरण के स्वर पढकर मैं अभिभूत हो गया। ये कविताएं बहुत शीघ्र श्री हनुमानचालिसा की भांति मुझे मुखस्थ हो गई। रामायण की चौपाइयों, गीता के श्लोकों, राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त और रामधारी सिंह की कविताओं के अतिरिक्त श्रीमन्त वाजपेयी की पंक्तियों को प्राय: मैं अपने व्याख्यानो के उचित सन्दर्भ मे उद्धृत करता हूं। श्रोताओं की तालियां मेरा हौसलाफजाई करतीं है।
श्री वाजपेयी की कविताओं की समीक्षा करते हैं तो हम पाते हैं कि कथ्य और कलात्मकता (thematic and stylistic pattern ) की दृष्टि से वह रामधारी सिंह दिनकर के सन्निकट हैं । दोनो ही मनीषियों के काव्य मे मानवीय मूल्यों के प्रति संवेदनशीलता , शौर्य व वीरता के स्वर तथा राष्ट्रजागरण का आह्वान है। "हिमालय" शीर्षक अपनी प्रख्यात कविता में दिनकर राष्ट्र को सम्बोधित करते हैं तथा हिमालय के माध्यम से भारतवर्ष में पुनर्जागरण का आह्वान करते हैं :
" तू पूछ अवध से राम कहाँ ?
वृन्दा बोलो घनश्याम कहाँ ?
ओ अरि उदास गंडकी बता,
विद्यापति कवि के गान कहाँ ?"
रे ! रोक युधिष्ठिर को न यहां ?
जाने दे उनको,उनकोस्वर्गधीर,
पर फिरा हमें गांडीव - गदा ,
लौटा दे अर्जुन भीम वीर ।
कह दे शंकर से आज करें,
वह प्रलय नृत्य फिरएकबार,
सारे भारत मे गूंज उठे ,
हर-हर, बम-बम का महोच्चार ।
तू मौन त्याग, कर सिंहनाद,
रे तपी, आज तप का न काल,
नवयुग शंख ध्वनि जगा रही,
तू जाग, जाग मेरे विशाल ।"
अब श्रीमन्त वाजपेयी की सुसुप्त राष्ट्र मे नवजागरण के आह्वान करती "महोदधि की छाती से" शीर्षक कविता की सुन्दर काव्य पंक्तियाँ देखिए:
शुन्य तटों से सर टकराकर ,
पूछ रही गंगा की धारा,
सगर सुतों से भी बढ़कर मृत ,
आज हुआ क्या.भारत सारा ।
यमुना रोती कहाँ कृष्ण हैं ?
सरयु कहती राम कहाँ है ?
व्यथित गंडकी खोज रही है ,
चन्द्रगुप्त बलधाम कहाँ है ?
अर्जुन का गाँडीव किधर है ?
कहाँ भीम की गदा खो गई ?
किस कोने मे पांचजन्य है ?
कहाँ कृष्ण की शक्ति सो गई ?
अलक्षेन्द्र को धूल चटाने ,
वाले पौरुष फिर से जागो ,
क्षत्रियत्व विक्रम के जागो ,
चनकपुत्र के निश्चय जागो ।
पृथ्वी की संतान भीक्षु बन
परदेशी का दान न लेगी,
गोरी की संतति से पूछो ,
क्या हमको पहचान न लेगी?
हम अपने को ही पहचाने,
आत्मशक्ति का निश्चय ठाने,
पड़ी हुई जुठी शिकार को,
सिंह नहीं जाते हैं खाने ।"
श्री अटल जी सामाजिक संस्कारों के उच्च प्रतिमान थे।
अपने बाबुजी से प्राप्त दो संस्मरणों का उल्लेख मैं प्रासंगिक समझता हूं । यह घटना सन् 1969-70 की है।उनकी एक आमसभा मेदिनीनगर (पूर्व नाम डालटनगंज) मे आयोजित थी। वह विमान से राँची आए। सड़क मार्ग से आगे की यात्रा करनी थी । भारतीय जनसंघ, राँची
जिलाध्यक्ष के रूप मे मेरे ताउ जी उन्हें स्कार्ट कर रहे थे । निर्णय हुआ कि लंबी यात्रा मे कहीं अल्पविश्राम हो । ताउजी ने कहा, " लताहार में आपकी विटिया का घर है न ! " अटल जी ने अविलंब उत्तर दिया, " बिटिया के घर तो डालियाँ लेकर जाना होगा । " तुरंत उन्होंने सूखे मेवे से भरी पांच सुसज्जित डालियाँ मंगवाई । ये उपहार बेटी, दामाद, समधी, समधन को उनकी ओर से भेंट किए गए।
दूसरा संस्मरण भी इसी यात्रा से जुड़ा है । उनका भोजन
लगभग पचास भद्रजनों, कार्यकर्ताओं के साथ मेदिनीनगर के एक सज्जन के यहां नियत था। पातिए पर पंगत, और पत्तलों पर भोजन का परवेशन हो चुका था। बाबुजी उनके सनिकट बैठाए गए थे । मंत्रोच्चार से पूर्व एक कटोरे मे उनके लिए दूध लाकर रखा गया । उन्होंने बड़े नाटकीय अंदाज में पूछा, " यह क्या है ? क्या यह सबको दिया जा चुका है ?" परवेशक ने सहमते हुए कहा कि सबके लिए इसकी व्यवस्था नहीं हो पायी है । "तो फिर इसे तुरंत वापस ले जाइए , मैं वही भोजन करुंगा ,जो सभी कार्यकर्ता करेंगे ।" उन्होंने बड़ी सौम्यता से कहा। मुझे रामायण का वह सन्दर्भ याद आता है, जब भगवान राम के राज्याभिषेक की सारी तैयारी हो चुकी है, तो वह बड़ी सहजता से कहते हैं :
जनमे एक संग सब भाई, भोजन, शयन ,केलि, लरिकाई ।
करणवेध, उपवित, विआहा , संग-संग सब भए उछाहा ।
विमलवंश यहअवगुण एकु,वन्धुविहाई,बड़ेहीअभिशेकू ।"
मुल्क राज आनन्द के एक उपन्यास "अनटचेबल" का केन्द्रीय पात्र बक्खा महात्मा गांधी के जादुई व्यक्तित्व पर
मुग्ध है। ज्यों ही उसे जानकारी होती है कि वह उसके शहर पधार रहे हैं , वह सारा काम छोड़कर, अपना सुध-बुध खोकर उस मैदान और फिर मंच की ओर भागता है , जहाँ से वह सभा को संबोधित करने वाले थे। श्री बाजपेयी के सन्दर्भ मे यह बात सम्पूर्णत: सत्य है । ज्यों ही यह उद्घोषणा होती कि श्री अटल बिहारी वाजपेयी अमूक शहर, तिथि, दिन ,समय एक विशाल जनसभा को संबोधित करेंगे, डेढ़-दो सौ किलो मीटर की परिधि में बसे जनसमुदाय में यह चर्चा का विषय बनता । दूर दराज के लोग शहर पहूचने की योजना बनाते । सभा के दिन बड़े सवेरे से शहर आनेवाले सभी सड़कों पर दौड़ रहे सैकड़ों वाहनो का एक ही गन्तव्य होता ,अटल जी का सभास्थल । शहर के आबालवृद्धनरनारी, बाजारों के मजदूर-व्यापारी, कालेजों के छात्र - अध्यापक, कार्यालयों के कर्मचारी-अधिकारी घंटों पूर्व चलकर मैदान में अपना स्थान सुनिश्चित कर लेते । हम युवा लोग उनके सुरक्षा चक्र का दस्ता बनते । हमारी ड्यूटी यह सुनिश्चित करना होता कि कोई सन्देहास्पद मानुस उनके निकट न फटकने पाए । उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद यह जिम्मेवारी एसपीजी के सूरक्षाधिकारियों ने संभाल ली।
अभी-अभी एक शोध के अध्ययन मे पढ़ा कि 2013 तक देश मे निर्मित कूल सड़कों के 50℅ का निर्माण श्री बाजपेयी के कार्य काल में हूआ । पोखरण परमाणु परीक्षण का आधिकारिक विडिओ देख कर गौरवान्वित हुआ कि किस प्रकार हमारे वैज्ञानिक सेना के गणवेष में अमेरिकी सेटेलाइट से बचने के लिए रात्री के अंधेरे मे काम किया । कारगिल युद्ध के उत्तरार्ध्द के वह दिन याद कीजिए जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बिना बुलाए अमेरिका जाकर गिड़गिड़ा रहे थे कि वह भारत को युद्ध बन्द करने के लिये वाध्य करे। "जय जवान, जय किसान,जय विग्यान" महज नारा नहीं अपितु " परम् वैभवम् नेतुमेततस्वराष्ट्रम् " का विज़न है । मैं प्रायः यह सोचता हूँ कि ऐसा स्वप्नद्रष्टा, युगपुरुष अपने युवा काल मे यदि हमारे देश का डेढ़-दो दशक नेतृत्व कर पाता तो हम नि:संन्देह विश्व के अग्रगण्य राष्ट्र होते ।
जब मेरे प्रग्या चक्षु खुले तो मैंने श्री मन्त बाजपेयी का निकट सान्निध्य प्राप्त करने का प्रण किया । घटना लगभग
एक दशक पूर्व की है। यह मेरे ग्रंथ के आधान का काल था । पुस्तक "The Essence of Gandhian Philosophy" (It's Impact on our Literature) पूर्ण हो चुकी थी और प्रकाशन से पूर्व इसपर विद्वानों की
सम्मति , प्रशस्ति प्राप्त करने के निमित्त मैं देश के विभिन्न नगरों, विश्वविद्यालयों के प्रवास पर था । विद्वानों की मेरी सूची में श्री अटल विहारी वाजपेयी का नाम शीर्ष पर था । मैंने उनके कार्यालय से सम्पर्क किया । दूसरे ही दिन मुझे उनके निजी सचिव श्री जिंजटा जी का फोन आया । मुझे बताया गया कि अटल जी ने मेरी पुस्तक पर मुझसे चर्चा करने की सहमति प्रदान की है । अगले दिन मैं उचित समय पर 6ए , कृष्णमेनन मार्ग उपस्थित हुआ। सुरक्षा जांच तथा उचित आवभगत के पश्चात मुझे उनके बैठक कक्ष मे ले जाया गया । अपने संस्कारों के अनुरूप मैंने उनका अभिवादन किया , तथा गले लगाकर उन्होंने मुझे अभिसिक्त किया । मैंने अपने पुस्तक के प्रथम अध्याय " Gandhi : the Literary and Spiritual Mentor" मे उद्धृत उनकी पंक्तियों को उन्हें दिखलाया । वह पहले आश्चर्य और फिर आनन्दित हुए। पुस्तक की विषय सामग्री देखकर उन्होंने कहा, " महात्मा गांधी के दर्शन में हिन्दुत्व के तत्व दिखलाकर आपने श्रेष्ठ कार्य किया है। पुस्तक छपते ही मुझे मेरी प्रति मिल जानी चाहिए ।" उन्होंने हंसते हुए कहा । "यह मेरा सौभाग्य होगा" मैंने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया । मैंने उन्हें कहा कि किशोर वय से ही मंचों से मैं आपकी कविताओं का पाठ करता रहा हूँ । उनके आग्रह पर मैंने "एक नहीं, दो नहीं करो बीसों समझौते, पर स्वतंत्र भारत का मस्तक नहीं झुकेगा" तथा " न यह समझो कि हिन्दुस्थान की तलवार सोयी है " इत्यादि कविताएं सुनाई । वह बड़े प्रफूल्लित हुए । मुझे बीस मिनट का समय मिला था । लगभग पचास मिनट कैसे ब्यतीत हो गए पता नहीं लगा । उन्होंने आगमन के लिए धन्यवाद किया तथा पुनः मिलने की इच्छा बताकर मुझे विदा किया । जब मैं देहलवी बना, तो प्रायः वह अस्वस्थ रहने लगे ।
उनसे मिलने वाले लोगों की संख्या में कटौती की जाने लगी। फिर यह उनके जन्मोत्सव वाले तिथियों 24,25, 26 दिसम्बर को सीमित कर दी गईं। 25 दिसम्बर को राष्ट्र पति, प्रधानमंत्री, मंत्रीमंडल के वरिष्ठ सदस्य प्रभृति विशिष्टजन ही मिल पाते थे । 24 दिसम्बर को मिलने वालों की सूची में प्राय: मेरा नाम होता । पिछली बार जब मुझे उनका दर्शन हुआ उनका कक्ष व विस्तर किसी विशिष्ट अस्पताल के आइसीयू में बदल चुका था । मेरे साथ उनके परिवार के सदस्य, सम्बन्धी तथा उनके मंत्रिमंडल के कुछ सदस्य थे । मै उनका हाथ अपने हाथों मे लिए लगभग 10 मिनट तक उनके साथ रहा। जिंजटा जी उनके कान में हम सबका परिचय कराने की कोशिश कर रहे थे , लेकिन वह देख व सुन पाने की स्थिति में नहीं थे। सबकी आखें आप्लावित थीं। सबने मन ही मन प्रणाम किया तथा विदा हुए। श्री अटल विहारी वाजपेयी के युगांतरकारी व्यक्तित्व का फलक इतना व्यापक है कि कुछ सौ शव्दों मे उनके वृत का वर्णन असंभव है । उनके जैसी विभूतियां सदियों बाद धरा धाम पर प्रकट होतीं हैं। मैं उनकी ही कुछ पंक्तियों को मात्र एक शव्द 'वर्ष' की जगह 'दिवस' सम्पादित कर, उद्धृत कर उन्हे श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ :
"दिवस हुए ही कितने, पथ पर राही एक चला था,
अन्धकार का वक्ष चीरकर , दीपक एक जला था ।
दैन्य दास्य का पंक दबाकर शतदल कमल खिला था ,
काल रात्रि को भेद , ज्योति का प्रवर पून्ज निकला था,
कैसा था वह भग्त स्वयं भगवान बन गया ?
कुम्भकार की कृति , स्वयं निर्माण बन गया ?
आज नहीं वह किंतु पंथ पर चरण चिन्ह अंकित है ।
मनु के वंशज प्रलय काल से क्यों शंकित है ।
आओ युग के सपनों को साकार करें हम
मृतकों मे नव जीवन का हूकार भरें हम "
🎂🎂🎂
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