# डा० विनोद कुमार तिवारी
जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु , ध्रुवंजन्म मृतस्य च ।
तस्मात परिहार्ये अर्थे ,न त्वं शोचितुमर्हसि ।।
...27, द्वितीय अध्याय ,श्री मद्भागवत गीता
"विनोद चाचा", कल्याण द्वारका से फोन पर,
"कल्याणजी कैसे हो ?" मैंने सहजता से पूछा ।
"चाचा बहुत बुरी खबर है"आवाज मे भय और
घबराहट ।
"क्या हुआ कल्याण ?" मैंने डरकर पूछा ।
"राजमणि चाचा का अभी अभी तुरंत दुखद निधन हो गया है।"
मै स्तब्ध था । मैंने कहा,"कल्याण तुम अपने को संभालो " मैंने वाक्य पुनः दुहराया ।
फिर रांची से बाबुजी का फोन। मैने कहा,
"बाबुजी, मुझे समाचार प्राप्त हो गया है।"
मैने बाबुजी से आग्रह पूर्वक कहा कि इस विकट परिस्थिती में वह अपने को सम्हालें।
राजमणि तिवारी, ग्राम जामुन्डीह, पलामूं ।
हमारे पितामह पं० बुद्धनंन्दन तिवारी जी के कुल में सबसे बड़े काका के जेष्ठ पुत्र । जब वह किशोर वय के थे, पिता श्री विश्वनाथ तिवारी जी नहीं रहे । माता श्रीमति सोनादेवी , एक वीर महिला। पंच यशस्वी काकाओं श्री रघुनाथ तिवारी जी , श्री लोकनाथ तिवारी जी , श्रीरमावल्लभ तिवारी जी, श्री दामोदर तिवारी जी, श्री रामस्वरूप तिवारी जी की छत्रछाया में विशेष वात्सल्य के साथ लालनपालन ।
बालम काका (श्री रमावल्लभ तिवारी) उच्च विद्यालय लेस्लीगंज के प्राचार्य रहे। समुचित शिक्षा के पश्चात राजमणि तिवारी जी बिहार शिक्षा सेवा में अध्यापक बने । झारखंड के विभिन्न विद्यालयों में अध्यापक व प्रधानाध्यापक रहे । तीन दशकों से अधिक सेवा के पश्चात अभी कुछ वर्ष पूर्व ही तो सेवा निवृत्त हुए थे । सैकड़ो संस्मरण शिक्षाधिकारियों के साथ, सहकर्मी अध्यापक वन्धुओं के साथ , पूर्व छात्रों के साथ जो बड़े होकर उनका अभिनन्दन करने व उनसे आशीर्वाद लेने मिष्टान्न के साथ उनसे मिलने आते । हमारी बैठकों में वह बड़ा रोचक वर्णन करते । प्रेरणादायक व मनोरंजक भी ।
हम सबके प्रिय मणि भइया सुन्दर सौम्य व्यक्तित्व के धनी, मुखमंडल पर प्रसन्नता, वाणी में मधुरता, व्यवहार में विनम्रता, हृदय में उदारता, दृष्टिकोण में विशालता उनके आभूषण रहे, सचमुच गरिमामयी व्यक्तित्व के जीवंत प्रतिमान । गांव, समाज का हर व्यक्ति, आबालवृद्धनरनारी उन्हें उचित मान सम्मान व प्यार देता ।
विगत दिनों प्रिय अरुण जेटली जी एवं सुषमा स्वराज जी के असामयिक दिवंगत होने की घड़ी मे लिखे अपने संस्मरणों में मैंने आंग्ल कवि लार्ड वायरन की कविता की एक पंक्ति उद्धृत किया..."आफ हूम गाड लव्ह्स डाइ यंग" अर्थात ईश्वर जिन्हें प्यार करता है, वे समय पूर्व ही ईश्वर के प्रिय हो जाते हैं । मैं समझता हूँ मणि भइया के सन्दर्भ में यह उक्ति सम्पूर्णत: सत्य है । उनका असामयिक महाप्रस्थान हमारे परिवार के उपर कोई वज्राघात से कम नहीं है । पीड़ा अभिव्यक्ति के लिए कोई शब्द नहीं , कोई क्षतिपूर्ति नहीं ।
भगवान कृष्ण का आश्वासन ही हम सबके लिए एकमात्र संबल है :
"जातस्यहिध्रुवोमृत्यु, ध्रुवंजन्ममृतस्य च" अर्थात प्रत्येक जातक का मृत्यु तथा मृतक का जन्म ध्रुव सत्य है । अतएव प्रिय से प्रिय व्यक्ति के विदा होने पर भी शोक करना ज्ञानी का कर्तव्य नहीं है ।
मेरे बाबुजी, जो हमारे बीच भारतीय ज्ञान व मीमांसा के धरोहर हैं, रामायण कथा में महराज दशरथ के महाप्रस्थान के पश्चात विलखते भरत को सान्त्वना देते गुरु वशिष्ठ का सन्दर्भ देते हैं । वशिष्ठ कहते हैं कि कौन शोक करने के योग्य है । वह जो अज्ञानी है, मूढ़ है, कृपण है, जिसने अपने धन का उपयोग कभी
दूसरे के कल्याण के लिए नहीं किया । बाबुजी कहते हैं कि जिन्होंने उच्ची आवाज में कभी बात नहीं किया, जो सदैव दूसरे के सहयोग के लिए तत्पर रहते ऐसे थे राजमणि बाबू । उनका सौम्य जीवन सदा पाथेय रहेगा ।
मणि भइया के दोनो पुत्र किसी भी पिता के योग्यतम संतति हैं । दोनो बच्चे हमारे उच्च कुलीन भारतीय संस्कारों के यशस्वी प्रतिनिधि हैं । किशोर कुमार जी गांव तथा जिला मुख्यालय मेदिनीनगर मे रहकर विविध समाज प्रकल्पों से सम्बद्ध हैं, जबकि छोटे भाई चंन्दन कुमार अभियंता हैं तथा सम्पत्ति बंगलुरू में पद्स्थापित हैं । उनकी चारों पुत्रियाँ शोभारानी, चन्दारानी, शशिबाला रानी तथा वंन्दना रानी पिता तथा श्वसुर दोनो कुलों के उच्च संस्कारों की उन्नायक हैं ।
मणि भइया की अर्धांगिनी श्रीमति प्रभावती देवी भारतीय महिला संवेदनाओं की जीवंत प्रतिमान हैं । आप नाते में भले हमारी भावज हों, किन्तु आप हमारी माताओं की समकक्ष रहीं है। आप जब बहु बनकर हमारे कुल में आईं , हम सब भाई शिशु व बालक थे और हमारे लालन पालन में आपका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा । सीबीएसई आंग्लभाषा के पाठ्यक्रम में उड़िया से अनुदित एक कथा मैं वर्षों तक पढ़ाया जिसमें एक भावज शहर से आने वाले अपने देवर के लिए विशेष स्वादिष्ट व्यंजन बनाती है, जो उसे बहुत पसंद है । कक्षा में मैं जब जब यह पाठ पढ़ाता आपका व्यक्तित्व मेरे मानस में जीवंत होता ।
मैं जब भी गांव आता आप चोखे के साथ चने का सगौर अपने "विनोद बाबु'' को खिलाना नहीं भूलतीं । भाभी ! जो स्वाद आपके द्वारा बनाए मालपुए, धुसके , दुधौरे में थे ,वे दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई के व्यंजनों में दुर्लभ है ।
यह सत्य है कि मणि भइया शरीर रुप में हमारे बीच नहीं हैं , लेकिन हमारा अस्तित्व शरीर मात्र से ही नहीं है। जगत गुरु आदि शंकराचार्य ने क्या कहा ..."चिदानंदरुपं शिवोहं शिवोहं"।
सत् चित् आनंद के भाव रुप में वह सदैव हमारे बीच ही रहेंगे , ऐसा हमारे शास्त्र, दर्शन कहते हैं।
यद्यपि उनकी अनुपस्थिति अपूरणीय है, किन्तु
यदि हम एक दूसरे के लिए जीने का संकल्प लें, तो इस पीड़ा को न्युनतम किया जा सकता है ।
ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें हम सबको इस पीड़ा को सहने का सामर्थ्य ।
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