Thursday, 8 October 2020

रजवाडीह : मेरे बचपन की काशी 1

       
          # डा० विनोद कुमार तिवारी #
पलामूं जिला मुख्यालय से हजारीबाग मार्ग पर सातवें किलोमीटर का ड्राइव । पान, चाय- चौपालों पर संंसदनुमा राजनैतिक बंहस, कोई भाजपा प्रवक्ता के रुप में यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऐतिहासिक निर्णयों की वकालत कर रह हो,अथवा कोई कांग्रेस प्रवक्ता के रुप मे धूर्तता पूर्वक उसका खंडन कर रहा हो, तो समझ लिजिए आप रजवाडीह की धरितृ
पर खड़ें हैं ।
यद्यपि राजनैतिक परिचर्चा यहां की मूल प्रकृति नहीं है ,यह तो देश, काल जन्य है । रजवाडीह की पहचान रामायण व आध्यात्म की परिचर्चा व गायन है जिसे यहां की युवा पीढ़ी ने अपने महान पूर्वजों से थाती के रुप मे प्राप्त किया है ।
जब आप अपने सोफ्टवेयर मे "रजवाडीह'' लिखें और आपके सहयोग के निमित्त गुगल अंकल जो समानधन्यात्मक शव्द संकेत करते हैं, उनमें 'रजवाड़े' एक महत्वपूर्ण विकल्प है।
कहते हैं कि स्वतंत्रता के समय हमारे देश में लगभग छे सौ स्टेट्स , रजवाड़े थे । अब रजवाडीह उन रजवाड़ों मे सम्मिलित था या नहीं, यह शोध का विषय हो सकता है , किन्तु  मैं समझता हूँ यहां के भद्रलोक की जीवन शैली किसी रजवाड़े से कम नहीं है ।
कहते हैं कि यहां सर्वसम्मानित पान्डयों का परिवार "महतो घराना'' कहलाता है। यह 'महतो' कोई जातिवाचक संज्ञा नहीं अपितु सम्मान बोधक है,जो सैकड़ों वर्ष पूर्व ब्रिटिश शासकों  द्वारा इन्हें प्राप्त हुआ । मैंने बड़ी उत्सुकता से महतो शब्द की ब्युत्पति का अध्ययन किया । मैंने पाया कि यह संस्कृत के 'महत्' से ब्युत्पन्न है ,जो हमारे शास्त्रों में 'महान' व महत्वपूर्ण' के अर्थ में पुनः पुनः प्रयुक्त हुआ है, यथा देखिए बाल्मीकि रामायण :
"काव्ये रामायणम कृष्टम सीतायाः चरितम महत्" । 2 अर्थात "रामायण महाकाव्य में सीता का चरित्र बहुत महान है।"
यहाँ यह कहना अप्रसांगिक नहीं है कि स्वयं ''पान्डेय'' शब्द जो सम्प्रति ब्राह्मणों में एक श्रेष्ठ कुल के अर्थ में रुढ़ हो गया है भी "कुलीनता" व "पांडित्य"  का बोधक ही है। उत्तर प्रदेश के कई अंचलों में श्रेण्य कायस्थ कुलों  में अपने नाम के पूर्व गर्वपूर्वक 'पान्डेय' लिखने की परिपाटी है । हरिवंशराय बच्चन ने अपनी "मधुशाला" की प्रस्तावना  मे लिखा है कि उनका परिवार 'पान्डेय' कहलाता है ,तथा उनके पूर्वजों ने कभी मांस-मदिरा का स्पर्श तक  नहीं किया । 3
बच्चन को यह हलफनामा इसलिए देना पड़ा क्योंकि मधुशाला के लोकप्रिय होने के पश्चात महात्मा गांधी के पास यह शिकायत की गई कि बच्चन तो मधिरा पान को गौरवान्वित  कर रहा है । बच्चन ने गांधी को आश्वस्त किया कि यह आरोप सत्य नहीं है तथा यहाँ हालावाद के प्रतिमानों के आलोक में मानवीय प्रवृत्तियों पर टिप्पणी की गई है ।
रजवाडीह के पान्डेयों के इसी महान कुल में अब से लगभग सार्द्धशती वर्ष पूर्व एक महान मनीषि श्री वाणीराम पान्डेय का जन्म हुआ ।
कहते हैं कि बालक के जन्म के अविलंब पश्चात उसकी वाणी(श्रीमुख) से "राम" शब्द
उच्चारित हुआ। धर्मात्मा पिता श्रीमान बुटूराम पान्डेय जी अभिभूत हुए  और बच्चे का नाम रखा वाणीराम पान्डेय ।
वाणीराम पान्डेय पांच यशस्वी पुत्रों के पिता
हुए: श्री परमानंद पान्डेय, श्री महादेव पान्डेय, श्री महावीर पान्डेय, श्री देवनन्दन पान्डेय तथा श्री सूर्यदेव पान्डेय । पान्डेयों के इस श्रेण्य कुल से मेरे बड़े आत्मीय सम्बन्ध हैं । यह मेरा मातृकुल है, और इस मातृऋण से अनुप्राणित होकर ही मैंने यह शोध आलेख लिखने को प्रेरित हुआ । (यह शोधआलेख भविष्य में प्रकाशित मेरी संस्मरणात्मक पुस्तक का एक अध्याय है।)
मेरी महान माता श्रीमती कमला देवी (दिवंगता) श्री वाणीराम पान्डेय के कनिष्ठ पुत्र श्री सूर्यदेव पान्डेय की द्वितीयात्मजा थीं । अतएव ये सभी भाई मेरे नाना तथा वाणीराम पान्डेय जी मेरे प्रनाना हुए । श्री परमानन्द पान्डेय जी तथा सूर्यदेव पान्डेय जी क्रमशः जेष्ठ व कनिष्ट भ्राता पलामू के प्रसिद्ध अध्यापकों में रहे , आज भी जपला तथा अन्य अंचलों मे उनके पढ़ाए सैकडों शिष्य मिलेंगे । श्री परमानन्द पान्डेय जी गणित के श्रेण्य ज्ञानी  थे, अंकगणितीय के क्लिष्ट पश्नों का हल उनकी ऊंगलियों पर होता तथा इसके समाधान का सूत्र की काव्यात्मक ब्याख्या उनके श्रीमुख पर । यह विडंबना है कि ऐसा अध्यापन उस पीढ़ी के साथ ही विलुप्त हो गया तथा आधुनिक बच्चों की प्रतिभा मोबाइल तथा कैलकुलेटरों के प्रति आसक्त होकर कुंठित सी  हो रही है।
श्री महादेव पान्डेयजी शिव व कृष्ण की परंपरा में पर्यावरण, गौपालन तथा कृषिविशेषज्ञ थे । श्री महावीर पान्डेय जी संतप्रवृति के यायावर थे । श्री देवनन्दन पान्डेय जी भारतीय सेना में  अधिकारी थे । स्वाभाविक है उनका व्यक्तित्व
नारिकेल फल के समान दृढ़ था , किन्तु उनका हृदय नवनीत के समान कोमल ।
श्री सूर्यदेव पान्डेय जी से मैंने समाज व गृहोपयोगी वस्तुएं बनाने के दर्जनों कौशल सिखा है । सभी नानाओं को दिवंगत हुए कई दशक ब्यतीत हो चुके हैंं और यह संस्मरण मैं लगभग अर्द्ध शताब्दी पूर्व की स्मृतियों के आधार पर लिख रहा हूँ और अबतक गंगाजी में असीम जल प्रवाहित हो चुका है ।
पांच नानाओं के बीच लगभग दर्जन भर मामाओं की श्रृखंला : श्री संजय कुमार पांडेय(दिवंगत), श्री शिव कुमार पान्डेय (दिवंगत), श्री राधाकृष्ण पान्डेय, श्री भूषण कुमार पान्डेय, श्री रमेश कुमार पांडेय, श्री अवधेश कुमार पान्डेय,श्री मदन कुमार पान्डेय , श्री अखिलेश्वर पान्डेय , श्री मुरलीधर पान्डेय, श्री जनार्दन पान्डेय (दिवंगत), श्री रतन कुमार पान्डेय । सभी तेजस्वी, सभी यशस्वी ।
जर्मन दार्शनिक प्रोफेसर फ्रेडरिक मैक्समूलर ने लिखा है, "हे ईश्वर ! हमारा अगला जन्म भारतवर्ष मे हो, और उस परिवार में जहाँ लोग  देववाणी संस्कृत में संभाषण व वार्तालाप करते हों।" 4 संस्कृत में संभाषण कैसे संभव है ,यदि इस निमित्त उचित शिक्षण व प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं हो । श्री संजय कुमार पान्डेय ने इस महती आवश्यकता को समझा तथा इस निमित्त अपनी भूमि दान कर संस्कृत शिक्षण संस्थान की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया ।
श्री रतन कुमार पान्डेय इस संस्कृत विद्यालय के स्वप्नद्रष्टा रहे तथा आजीवन इस संस्था का संवर्धन किया । यह हर्ष का विषय है कि हमारी   सरकार ने देश में तीन संस्कृत विश्वविद्यालयों की स्थापना का विधेयक संसद में पास कर दिया है । रजवाडीह का यह संस्कृत विद्यालय यदि इन किसी भी विश्वविद्यालय से संबद्धता प्राप्त कर लिया तो यह पलामुं ही नहीं, अपितु यह सम्पूर्ण झारखंड व विहार का महत्वपूर्ण संस्कृत शिक्षण संस्थान बन सकता है ।
श्री शिव कुमार पांडेय उच्च विद्यालय लेस्लीगंज में अंगरेजी के आचार्य तथा पुनः प्राचार्य रहे । सम्प्रति अंगरेजी शिक्षण के कार्यशालाओं मे मुझे विषय विशेषज्ञ (Resource Person) के रुप में आमंत्रित किया जाता है, किन्तु बड़ी विनम्रपूर्वक कहना है कि अंगरेजी लेखन कौशल की विद्यालयीय शिक्षा मैंने श्री शिवकुमार पान्डेय जी से प्राप्त की । इस प्रकार वह मेरे मामा तथा अध्यापक की  युगल भूमिका मे रहे । श्री अवधेश कुमार पान्डेय सैनिक बलों के कमांडेंट के रुप में देश के दर्जनों मुख्यालयों पर पदस्थापित रहे तथा देश को गौरवान्वित किया ।
सद्यदिवंगता सुशमा स्वराज जी श्रद्धांजलि सभा में मैंने लौर्ड वायरन की एक पंक्ति उद्धृत की "औफ हूम  द गौड लव्स डाइ यंग" 5 अर्थात अति मानवीय गुणों के कारण ईश्वर जिन्हें बहुत प्यार करता है, वे समय पूर्व ही ईश्वर के प्यारे हो जाते हैं।  वायरन की ये  पंक्तियाँ श्री जनार्दन पान्डेय जी के सन्दर्भ में पूर्णत: चरितार्थ हैं । अप्रतिम मेधाशक्ति, प्रफुल्लित मुखमण्डल , एक एक शब्द से विनम्रता की अभिव्यक्ति । विनयावनत हूँ मैं । श्री भूषण कुमार पान्डेय,  श्री अखिलेश कुमार पांडेय, श्री मुरलीधर पान्डेय, श्री मदन कुमार पान्डेय , श्री रमेश कुमार पांडेय इत्यादि सबके व्यक्तित्व में सरलता व गरिमा का सहज समाहार पढ़ा जा सकता है।
मामाओं के कीर्ति गायन के पश्चात यदि मामियों का चरित चित्रण नहीं हो, तो यह गाथा  पूर्णता को कैसे प्राप्त कर सकता है ।
सभी सुगढ़ ,सभी सुशील, सभी सुसंस्कृत ।
बचपन में अपनी माता-पिता के साथ या बाद मे अकेले भी जब हम रजवाडीह आते , हमारे आगमन का समाचार अतिशीघ्र सर्वत्र प्रसारित हो जाता, आबालवृद्धनरनारी तीन पीढ़ियों  का एकत्रीकरण हमारे स्वागत में, सबके मन में उल्लास । द्वार पर पन्ढार दिया जाता,  फिर उचित आसन प्रदान के पश्चात मामियों की मंडली , कठौते के जल में पांव प्रक्षालन, फिर अंगोछे से  प्रेमपूर्वक पांव पोंछकर आंचल के पल्लू को युगल हाथों मे लेकर पांव छुकर पंचप्रणाम करने के निमित्त अपनी पारी की प्रतीक्षा । विश्वविद्यालय के दिनों तक मैं इस पंचप्रणाम की सविनय अवज्ञा करता तथा अपने सांघिक प्रभाव मे इसके बदले हाथ जोड़कर नमस्ते करने का आग्रह करता । वे
हंहते हुए कहतीं, "विनोद बाबु ! रउवा भगिना ब्राह्मण ही । रउवा आशीर्वाद दिहूं । राउर आशीर्वाद से हमनी फलब फूलब ।" मेरे पास हाथ जोड़कर मन ही मन "एवमस्तु" कहने के अतिरिक्त कोई विकल्प ही नहीं होता ।
दशकों पूर्व की स्मृतियां हैं ये । अब  एक विचारक (idealogue) के रुप मैं यह समझता हूँ कि अतिथियों के आवभगत की यह परंपरा हमारी महान भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है,जिसे न केवल संजोए रखने की आवश्यकता है अपितु समस्त विश्व में इसे प्रसारित करने का हमारा दायित्व भी है ।  रामायण कथा मे केवट द्वारा भगवान राम का पाद् प्रक्षालन तथा महाभारत में धर्मराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में भगवान कृष्ण द्वारा आगत अतिथियों का अभिनन्दन इसी परंपरा का समष्टिकरण है ।
श्री राधाकृष्ण पान्डेय सम्प्रति इस कुल में सर्वाधिक वरीष्ठ युवा हैं । आपके महान व्यक्तित्व का चित्रण करते हुए मैं गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की एक एक सुंदर पंक्ति गुणगुना रहा हूँ जो उन्होंने प्रभू श्री राम से अपने सम्बन्धों के सन्दर्भ में लिखी है:
"तोहे मोही नाते अनेक मानिए जो भाए "6
आपकी उम्र मात्र तीस वर्ष है इसके अतिरिक्त आपको लगभग साठ वर्षों का सुदीर्घ अनुभव है । आपका पावन परिणय अब से लगभग साढ़े सात दशक पूर्व मेरी बुआ श्रीमती मुखपति दवी (सुपुत्री पंडित श्री बुद्धनंन्दन तिवारी जी, सुपौत्री पंडित श्री प्राणराम तिवारी जी, ग्राम जामुन्डीह, पलामूं ) के साथ हुआ ।
अतएव आप हमारे प्रिय फूफा जी हैं, और हैं श्री वाणीराम पान्डेय एवं श्री प्राणराम तिवारी
दो महान कुलों के बीच सेतुबंध रामेश्वरम । सम्प्रति आपके चरणों पर दोनो घरानों के सभी जनों के मस्तक नत होते हैं । मेरी बुआ अभी कुछ वर्ष पूर्व दिवंगता हो चुकी है तथापि आपके व्यक्तित्व के बड़प्पन मे चीर सातत्य है । मुखमंडल पर प्रसन्नता, वाणी में मधुरता, व्यवहार में विनम्रता, हृदय में उदारता और  दृष्टिकोण में विशालता आपके  व्यक्तित्व के आभूषण रहे हैं । मैंने आपकी ऊंगलियों को पकड़कर चला भी  है  और सम्प्रति आपके पांव कहीं उपर नीचे न पड़ जायं इस निमित्त  आपके हाथ पकड़कर आपको चलाता हूं । साष्टांग प्राणिपात ।
दर्शन भर मामाओं के बीच लगभग  तीन दर्जन मेरे ममेरे भाई बहन । सभी सभ्रांत व उच्च मानवीय मूल्यों के प्रतिमान । बहनें लगभग सभी अब अपनी-अपनी श्वसुर कुलों की राजमहिषी बन चुकीं हैं । सबकों मंगलकामनाएं हैं मेरी ।
भाइयों व भतीजों में कई उच्च पदस्थ सरकारी सेवाओं में, तो कई समाज सेवा में अपने कुलीन व्यक्तित्व की सुरभि बिखेर रहे हैं । मेरे कई भाई अध्यापक, कई अघिवक्ता और लगभग आधे दर्जन भारतीय सैनिक के रुप में देश सेवा कर रहे हैं । मैं अपने सभी भाइयों सर्वश्री उमाशंकर पान्डेय (अधिवक्ता), श्री गोविन्द कुमार पान्डेय (समाज सेवा), श्री रघुवंश मणि पान्डेय (बैंक अधिकारी), श्री राजीव रंजन पान्डेय (भारतीय डाक सेवा)श्री सत्यवान कुमार पान्डेय(अध्यापक),श्री सत्यनारायण पान्डेय,(अध्यापक)श्री दीपक कुमार पांडेय (समाज सेवा) , श्री अनिल कुमार पांडेय, श्री सुशील कुमार पांडेय, श्री अजय कुमार पांडेय, श्री आलोक कुमार पांडेय, श्री आनंदराज पान्डेय (भारतीय सेना) श्री आशीष कुमार पान्डेय, (भारतीय सेना) श्री प्रभात रंजन पान्डेय, श्री सुधीर रंजन पान्डेय, श्री ब्रजेश रंजन पान्डे(अधिवक्ता सर्वोच्च न्यायालय) श्री चिंतामणी पान्डेय (बैंक अधिकारी) ,श्री चन्द्रमणी पान्डेय, श्री श्रीकांत पान्डेय, श्री शशांक शेखर पान्डेय,
श्री संतोष कुमार पांडेय (अध्यापक), श्री गौरव कुमार पान्डेय, श्री अगस्त कुमार पान्डेय, श्री विकास कुमार पान्डेय को अभिनन्दन व उज्जवल भविष्य की मंगलकामनाएं सम्प्रेषित करता हूँ ।
भाइयों के पश्चात सभी भतीजों को भी मैं हार्दिक शुभकामनाएं अर्पित करता हूँ ।
डा० समीर कुमार पांडेय (गणित के प्राध्यापक, केन्द्रीय विश्वविद्यालय),अमित कुमार पांडेय, (अध्यापक), आशुतोष कुमार पांडेय (सम्पादक, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया),
प्रशांत कुमार पांडेय (झारखंड पूलिस सेवा), उज्जवल कुमार पांडेय (झारखंड पुलिस  पदाधिकारी), राकेश कुमार पांडेय, प्रेम कमल पान्डेय, राजकमल पान्डेय (भारतीय तिब्बत सीमा सुरक्षा बल), ऋषभ(भावीअध्यापक) सौरभ,विराट, सृजन, कार्तिकेय, राजशेखर, शुभांकर, आयुष, सुधांशु, शुभम, अंकित रंजन, अंकुर रंजन, सामंत, हेमंत, नमन, अनमोल, हिमांशु, हर्ष, यश, कृश , प्राशु, श्रेयश, आर्यन, मयंक राज, रुद्रराज इत्यादि तथा पौत्रगण यथा अभिनव, अर्णव, आद्वीक, अनुभव उत्कर्ष, अव्यांश, तथा ऋत्विक सबको
मेरा आशीर्वचन है । मै कामना करता हूँ कि आप सब अपने जीवन में चरम उत्कर्ष को प्राप्त करें ।
अपने भाइयों, भतीजों और पौत्रों के सम्मान और शुभेच्छा में मैं भारतीय आंग्ल कवि श्रीमान हरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय की सुन्दर पंक्तियाँ उद्धत करता हूँ :
   "Since we are in love with quest,
      We are friend of mountain tops,
    In movement alone is rest,
        Unbeatable when it stop." 7
इन सुन्दर पंक्तियाँ का सुन्दर पद्यानुवाद जो मैंने स्वयं किया है को उद्धृत करना भी यहां  उपयुक्त ही है :
    "हम अनंत के अन्वेशी हों,
               प्रिय हों हमको शैल शिखर ,
     गति मे ही सिर्फ यति स्थित,   
                रुक जाना ही सबसे दुश्वर ।" 8
 
रजवाडीह की सुबह अब से तीस चालिस वर्ष पहले काशी के "सुबहे बनारस" से कम रंगीन नहीं होती थी । आबालवृद्धनरनारियों  का भैसाखुर को प्रस्थान । पहले प्रवाहित जलाशय में स्नान फिर भगवान शिव का जलाभिषेक:
"नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् 
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिरा
ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्
करालं महाकाल कालं कृपालं
गुणागार संसारपारं नतोऽहम् " 9
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जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेवलम्ब्यलम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिवो शिवम्‌ ॥ 10
मंदिर में घंटा- वादन, धुम्र-आरती, तथ शंख- ध्वनि से सम्पूर्ण वातावरण पवित्र हो जाता ।
रजवाडीह के लोगों ने भैसाखुर को पलामू के प्रसिद्ध तीर्थ के रुम में विकसित किया;
पहले शिव मंदिर, फिर भव्य दुर्गा मन्दिर, सभामंडप, तरण ताल , मुख्य मार्ग से पहुंचपथ
सब सुन्दर, प्रशंसनीय । भैसाखुर के डगर को रजवाडीह के भद्रलोक के आगमन का इंतजार  आज भी है ।
रजवाडीह का सामाजिक सौहार्द हारमोनियम के सात सुरों के समान सुमधुर है । मैं समझता हूँ कि गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की सुन्दर पंक्तियाँ "सब नर करहीं परस्पर प्रीति" जो उन्होंने अयोध्या की समाज व्यवस्था का वर्णन करते हुए लिखा है, रजवाडीह के सामाजिक जीवन के सन्दर्भ में सम्पूर्णत:
सत्य हैं । मैने कई सामाजिक समारोहों में ब्राह्मणेत्तर वन्धुओं के यहां प्रेमपूर्वक  अन्नप्राशन किया है । एक बार नई दिल्ली से रांची की यात्रा के क्रम में सामने वाले बर्थ पर यात्रा कर रहे जैतुखाड़ के एक परिवार से सानिध्य हुआ । वह केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल मे इन्स्पेक्टर थे,तथा जम्मू कश्मीर के रजौरी जिले मे पदस्थापित थे। जैतुखाड़ जो रजवाडीह का एक पड़ोसी ग्राम है  जहां की लगभग शत प्रतिशत आबादी दलित दुशाध्य वन्धुओं की है । उन्होंने मेरे मामाओं व भाइयों का नाम बड़ी सम्मान व कृतज्ञता पूर्वक लिया । अतएव बिना किसी सन्देह के यह तथ्य स्थापित किया जा सकता है कि कौमरेड मित्रों ने जो भ्रांतियां फैलायीं हैं कि ब्राह्मणों ने दलितों का शोषण व आत्याचार किया है, यह सम्पूर्णत: मिथ्या अवधारणा (absolutely false narrative) है ।
रजवाडीह मे सम्प्रति आधा दर्जन देवस्थानम
हैं । मुझे बताया गया है सप्तमातृकाओं के प्राचीन मंदिर में छागशिशु बली की अंधपरंपरा वैष्णव पूजा में लगभग प्रत्यास्थापित हो गई है । वासंन्तिक नवरात्र की मांगलिक परिवेला में महावीर मन्दिर प्रांगण में आयोजित श्री रामचरित मानस नवान्हपारायण यज्ञ यहाँ सर्वाधिक भब्य सांस्कृतिक अनुष्ठान है । श्री
महावीर मंदिर प्रांगण सांस्कृतिक राष्ट्रवाद (Power House  of Renaissance of Cultural Nationalism) के नवजागरण के ऊर्जाकेन्द्र के रूप मे विकसित हुआ है। श्री हनुमानजी महाराज का व्यक्तित्व बहुआयामी है । वे अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं तो हैं ही, वे ज्ञानिनामअग्रगण्यम् भी है । प्रभुचरितसुनिवेकोरसिया उनकी प्रवृत्ति है, और जहां प्रभु श्री राम के चरित का गायन होगा, सर्वत्र ऋद्घि-सिद्घि की अभिवृद्धि तो होगी ही, भारतीय  सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भी अपने परमवैभवंतेतुमेततस्वराष्ट्म को प्राप्त होगा ,  क्योंकि मर्यादा पुरुषोत्तम राम के पावन चरितगाथा मे भारतीय राष्ट्रीयता  की ही तो अभिव्यक्ति हुई है । हिन्दी की सुन्दर काव्य पंक्तियों से मैं अपने आलेख का उपसंहार करता हूँ:
जब पंचवटी में कोई भी रावन घुस आया करता है,
भारत बन करके राम तभी कोदंड उठाया करता है ।
चल पड़ती युवकों की सेना पापी लंका सुलगाने को,
कोई भी रावण शेष नहीं रह जाता सिया चुराने को । 11
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सन्दर्भ:
1. आलेख का शीर्षक स्वामी विवेकानंद के भारत में दिए व्याख्यान से लिया गया है ।
2. 1/4/7 महर्षि वाल्मीकि विरचितम  रामायणम, गीता प्रेस, गोरखपुर, भारत )
3. प्रस्तावना, मधुशाला, हरिवंशराय बच्चन, राजपाल एन्ड संस, नई दिल्ली
4. Complete Works of  Prof. Fredrick Maxmuller, London
5.  Lord Byron, Winged Word by     David Green, London. 
6. कवितावली, गोस्वामी तुलसीदास, गीताप्रेस, गोरखपुर
7. हरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय, सरोजिनी नायडू के भाई हैं , तथा भारतीय आंग्ल काव्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं ।
8.  काव्यानुवाद, डा० विनोद कुमार तिवारी
9 .  शिवस्तुति, रामचरितमानस, गोस्वामी        तुलसीदास, गीताप्रेस,
10.  शिवतांडवस्तोत्र, स्तोत्ररत्नावली, गीताप्रेस, गोरखपुर
11 .श्री अटल बिहारी वाजपेयी, जागृति कके स्वर, लोकहित प्रकाशन, लखनऊ

टिप्पणी :  यह आलेख मेरे ब्लॉग gandhigeetafoundation पर भी पढ़ा जा सकता है ।)
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