Monday, 1 October 2018

भारतीय साहित्य मे महात्मा गांधी ◆ डा० विनोद कुमार तिवारी ◆ दिस इज द मैन, हू हैज स्टर्ड थ्री हंडरेड मिलियंस टू रिवोल्ट ........यह वही महामानव है, जिसने तीस करोड़ जनता को अन्याय के विरुद्ध क्रांति के लिए उद्वेलित किया, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिला दी, जिसने विगत दो हजार वर्षों मे राजनीति में सर्वाधिक सशक्त नैतिक मूल्यों की प्रस्थापना की ।" बीसवीं शताब्दी के महान यूरोपीय मनीषी रोम्यां रोलां की महात्मा गांधी को अर्पित यह श्रद्धांजलि यह सिद्ध करने को पर्याप्त है कि क्यों महात्मा गांधी को विगत दो हजार वर्षों का महामानव स्वीकार किया जाता है । समकालीन भारतीय इतिहास मे 1920 -47 का कालखंड गांधी युग के नाम से अभिहित किया गया है । भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इस संक्रमण काल मे महात्मा गांधी भारतीय राष्ट्रीय परिदृश्य मे हावी रहे । स्वाभाविक है उनका चिंतन एवं रणनीति ने भारतीय राजनीति की दशा और दिशा सुनिश्चित की ।उनकी छवि, उनका व्यक्तित्व एवं दर्शन ने लाखों. जनमानस को प्रभावित किया , जिसमें लेखकों, कवियों, उपन्यासकारों, नाटककारों व अन्य साहित्य मनीषियों की महती संख्या रही है । इन रचनाकारों ने महात्मा गांधी को अपना साहित्यिक व आध्यात्मिक मार्गदर्शक , मेंटर स्वीकार किया । भारतीय जनमानस मे महात्मा गांधी की छवि एक लिजेंड, एक अवतारी पुरुष, एक ओरेकल की रही है , जिसका पृथ्वी पर अवतरण भारत माता को फिरंगी रुपी दैत्य से मुक्ति प्रदान करने के प्रयोजन से हुआ । महात्मा गांधी का यही वह जादुई प्रभाव है जिसने भारतीय साहित्य के सभी भाषाओं के मनीषियों को गहराई तक प्रभावित किया तथा अपने साहित्य मे उनके विचार, दर्शन, एवं स्वतंत्रता संग्राम के विविध आयामों को अभिव्यक्ति प्रदान करने की प्रेरणा दी । मुल्कराज आनंद कृत अनटचेबल (अछूत) ,और राजाराव कृत कांतापुरा भारतीय आंग्ल साहित्य की उत्कृष्ट कृतियाँ हैं । इन दोनों उपन्यासों में गांधी दर्शन के केंद्रीय संकल्पनाओं की उदात्त अभिव्यक्ति हुई है । अनटचेबल का प्रकाशन 1935 मे हुआ । आनंद यहां हिन्दू समाज मे व्याप्त छुआछुत की बिमारी की चिकित्सा करते हैं, और गांधी द्वारा प्रस्तुत समाधान की संस्तुति करते हैं । आनंद गांधी से बहुत प्रभावित थे, साबरमती आश्रम में निवास किया । उपन्यास मे गांधी के व्यक्तित्व एवं आम जनता पर उनके चुम्बकीय प्रभाव का अद्भुत चित्रण है । 1942 मे प्रकाशित द स्वौर्ड एंड द सिकिलमे आनंद ने मार्क्सवाद एवं गांधीवाद के बीच द्वन्द्व का नाट्य निदर्शन किया है । 1945 मे प्रकाशित द बिग हार्ट मे आनंद मशीन एवं औद्योगिककरण के सन्दर्भ मे गांधी के विचारों को चुनौती देते हैं । राजाराव का कांतापुरा , जो 1938 मे प्रकाशित हुआ प्रख्यात उपन्यास है , जिसमें गांधीय मूल्यों की अभिव्यक्ति अन्यतम है । यह कृति गांधीय सन्दर्भों , विचारों, प्रतिमानों से आपूरित है एवं विषयवस्तु गांधी के व्यक्तित्व एवं दर्शन से आबद्ध है । यहां मिथक, वाड्मय, आध्यात्म, काव्य, राजनीति का अदभुत संगम है । लेखक ने यहां तीसरे दशक मे गांधी के नेतृत्व मे आयोजित समस्त आयोजनों यथा दांडी मार्च, सविनय अवग्या आन्दोलन, हरिजन उत्थान, स्वराज, स्वदेशी, नशामुक्ति अभियान, उपवास , चरखा, गांधी-इरविन समझौता,द्वितीय गोलमेज सम्मेलन इत्यादि का सजीव चित्रण किया है । के.एस. वेंकटरमणी भारतीय आंग्ल लेखन की यशस्वी उपन्यासकार हैं । "मुरुगन , द टिलर " तथा "कुन्दन, द पैट्रिओट " जैसी कृतियों की कल्पना गांधी के प्रभाव के बिना संभव ही नहीं हैं । प्रथम को "गांधी का अर्थशास्त्र " तथा द्वितीय को "गांधी का राजनीतिकशास्त्र " ठीक ही कहा गया है । 1955 मे प्रकाशित आर.के.नारायण का " वेटिंग फौर द महात्मा " भारतीय आंग्ल लेखन मे गांधीय साहित्य का अनुपम उदाहरण है । लेखक ने स्वयं इसे "गांधी का उपन्यास" कहा है । गांधी स्वयं इसमें केन्द्रीय पात्र है, तथा श्री राम व भारती की प्रणय कथा उनके परित: घुमती है ।लेखक ने राष्ट्रीय आंदोलन का सजीव वर्णन किया है । ख्वाजा अहमद अब्बास के "द इनकलाब" मे महात्मा गांधी एक राष्ट्र नेता के रुप मे चित्रित हुए हैं तथा जालियां वाला बाग नरसंहार से गांधी- इरविन समझौता तक का इतिवृत दर्शाया गया है । हिंदी साहित्य मे महात्मा गांधी को समर्पित पण्डित सोहनलाल द्विवेदी की पंक्तियों बड़ी हृदयस्पर्षी हैं : " चल पड़े जिधर दो डग मग मे, चल पड़े कोटि पग उसी ओर , गड़ गई, जिधर भी एक दृष्टि, गड़़ गए कोटि दृग उसी ओर , जिसके सिर पर निज धरा हाथ , उसके सिर रक्षक कोटि हाथ , जिस पर निज मस्तक झुका दिया, झुक गए उसी पर कोटि माथ । " ंआचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त , माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान , मुंशी प्रेमचंद, रामधारी सिंह 'दिनकर' , बालकृष्ण शर्मा नवीन , जैनेंद्र कुमार प्रभृति हिंदी के मुर्धन्य साहित्यकारों की स्वतंत्रता आंदोलन मे सक्रिय सहभागिता रही है । महात्मा गांधी इनकी रचनाओं के महत्वपूर्ण वर्ण्य विषय रहे हैं । गुजराती साहित्य मे काका कालेलकर , राम नारायण पाठक, किशोरी लाल माशरूवाला , महादेव देशाई , उमाशंकर जोशी, मेघनी सुन्दरम , खबरदार , स्नेहरश्मि , कन्हैयालाल मनिकलाल मुंशी , गौरीशंकर गोवर्धन दास जोशी इत्यादि गांधी युग के महती स्तंभ हैं । मेघनी कृत '' युगवन्दना '' गांधी युग की आत्मा को प्रतिबंधित करती है । महात्मा गांधी ने उन्हें स्वयं ' राष्ट्रकवि' कहकर सम्मानित किया । उमाशंकर जोशी की सत्याग्रह आंदोलन मे सहभागिता रही । उनकी कृति " विश्वशांति " गांधी के विश्व वंधुत्व एवं शांति के संदेश को सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान करती है । कन्हैया लाल मनिकलाल मुंशी कृत " स्वप्नद्रष्टा " मे हम देश मे गांधी के नेतृत्व मे लड़े स्वतंत्रता आन्दोलन की सुन्दर अभिव्यक्ति पाते हैं । काका कालेलकर की मातृभाषा मराठी है , किन्तु गांधी युग गुजराती साहित्य के वह अप्रतिम प्रतिनिधि हैं । किशोरीलाल माशरूवाला कृत "गांधीविचार दर्शन " एवं "गांधी और साम्यवाद " गांधी साहित्य का दिग्दर्शन है । महादेव देशाई पच्चीस वर्षों तक महात्मा गांधी के निजी सचिव रहे । स्वाभाविक है उनके डायरी के पन्ने गांधी के गरिमामयी व्यक्तित्व की सजीव झलक प्रस्तुत करते हैं । कन्नड़ साहित्य पर गांधी का असीम प्रभाव रहा है । दत्तात्रेय रामचन्द्र वेन्दरे कृत "अमर मरण", " सूर्यापन्न" सहित कई कृतियाँ एवं मस्ती वेंकटेश् आयंगर की अगणित रचनाएं गांधी को समर्पित रही हैं । के.पी. पुटप्पा , डी.वी. गुंडप्पा , जी. के. हेगड़े, वी. एच. श्रीधर , पी. टी.नरसिंह आचार्य, गौरव रामास्वामी आयंगर, विनायक कृष्ण गोकाक, के.इनामदार, टी.आर.शुभराव , कोटा शिवम, एम.यमुनाचार्य इत्यादि कन्नड़ साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर हैं । जी.पी. राजरत्नम कृत "संभवामि युगे युगे " गांधी पर केंद्रित सुन्दर नाटक है । गांधी शान्ति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली के वर्षों तक अध्यक्ष रहे श्री आर.आर.दिवाकर यशस्वी गांधीय दार्शनिक हैं। अंग्रेजी व कन्नड़ मे लिखी उनकी रचनाएं गांधी साहित्य के धरोहर हैं । असमी साहित्य मे राष्ट्रीय व गांधीवादी लेखकों की एक लंबी श्रृंखला है । लक्ष्मी नाथ बेजबरुआ कृत "आमार जन्मभूमि" , "मोरा देश", " असम संगीत" कमलाकान्त भट्टाचार्य कृत " चिंता और चित्रांगदा " अप्रतिम सौंदर्य की कृतियाँ हैं । प्रसन्न लाल चौधुरी, अंबिका गिरि राय चौधुरी , नीलमणि फूकन , फनक चन्द्र शर्मा, हेम बरुआ , बीरेंद्र कुमार भटटाचार्य, विजय चन्द्र भगवती, मफीदा बेगम , ज्योति प्रसाद अग्रवाला , सत्य प्रसाद बरुआ, प्रवीण फूकन , अतुल हजारिका , दीनानाथ शर्मा इत्यादि यशस्वी असमी गांधीवादी लेखक हैं । 'आमार सोनार बांगाल' भारतीय राष्ट्रीय पुनर्जागरण का 'इपिसेंटर' रहा है । बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय के मुखारविंद से निसृत शब्दों "वन्देमातरम" से सम्पूर्ण राष्ट्र भारत माता को प्रणाम करता है । कविकुल गुरु रवीन्द्र नाथ ठाकुर महात्मा गांधी से ऐसे स्नेह बद्ध थे कि अपने निर्वाण से पूर्व शान्ति निकेतन वह उन्हें सौंप दिया । नजरूल इस्लाम के "विद्रोही" मे राष्ट्रवाद की अग्नि प्रज्वलित है । उपन्यास सम्राट ताराशंकर वंद्योपाध्याय कृत "धातृदेवता", "गणदेवता" , "पंचग्राम " , "संदीपनी पाठशाला" इत्यादि गांधीय स्वतंत्रता आंदोलन के दर्पन हैं । सतीनाथ भादुड़ी, आनंद शंकर राय , मनोज वोसु , नवेन्दु घोस , सुमंत नाथ घोष , गजेन्द्र कुमार. मित्रा , सुबोध घोष वांग्ला गांधी साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं । महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास काल के सत्याग्रह आन्दोलन मे तमिलों की महती भूमिका रही है । तमिल लोक गीतों मे इसका अद्भुत चित्रण है । चक्रवर्ती राज गोपालाचारी के लेखन मे गांधी के विचार सर्वत्र व्याप्त हैं ।तमिल मानस पर इसकी गहरी छाप है। कहते हैं कि दश वर्षों के कालखंड मे तमिल गांधी साहित्य मे एक हजार पुस्तकों का प्रकाशन हुआ । वी. कल्याणसुन्दर, वी.एस . कोडायनायकी , अमल रामपिंगलम पिल्लई, पीर मोहम्मद पवलर , शंकर दास, आर.कृष्णमूर्ति कल्कि , देशिका विनायकम पिल्लई , ए.एल. वलिअपा , कोटमंगलम शुभ तमिल गांधी साहित्य के उज्जवल नक्षत्र हैं । क्षत्रपति शिवाजी महाराज एवं लोकमान्य बालगंगाधर तिलक द्वारा उच्चरित मराठी साहित्य में आचार्य विनोबा भावे , काका कलेलकर , दादा धर्माधिकारी , एस.डी. जावड़ेकर, एस. जे. भागवत प्रभृति साहित्य मनीषियों ने न केवल गांधी के प्रेरक विचारों को जन जन तक पहुचाया, अपितु उन्हें एक नया आयाम प्रदान किया । मराठी नाटककारों , यथा के.पी.खादिलकर ,वी.डी. वारेड़कर , मधुसुदन कालेलकर , एस.आर. विवल्कर , के नाटकों मे गांधी केन्द्रीय विषय रहे हैं । साने गुरुजी , प्रेम कंटक, बी. वि.वारेड़कर, श्री दांडेकर, विभावरी सिरोड़कर गांधीवादी मराठी उपन्यासकार हैं । वी. वी. बोड़कर कृत "महात्मायन" अठारह हजार पदों में लिखा अद्भूत गांधी महाकाव्य है। बसंत वापट,मंगेश पदगांवकर , डी. जी. केलकर, एम. टी. पदवर्धन , वी. आर तंबे, वी. डब्ल्यू सिरवाड़ेकर प्रख्यात गांधीवादी मराठी कवि हैं । महात्मा गांधी से गहरे प्रभावित वलथोल नारायण मेनन मलयालम साहित्य के अप्रतिम मनीषि हैं । आठ खंडों मे प्रकाशित उनकी "साहित्य मंजरी" गांधी के सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह, खादी, स्वदेशी, इत्यादि मूल्यों का निदर्शन करती है । वेणुगोपाल कुरुप कृत "स्वराज्य गीता " गांधी के जीवनवृत का दर्पन है । एस.शंकर कुरुप , केशव देव, एन. कृष्णन पिल्लई, के सुन्दरन , ई. गोविन्दन नायर मलयालम गांधी साहित्य के हस्ताक्षर हैं । उत्कल साहित्य में देशगीत गाने वाले कवियों की लंबी श्रृंखला है । पं. गोपवन्धु दास , मधुसुदन दास , रमा देवी , सरला देवी, कालिन्दी चरण पाणिग्रही उड़िया साहित्य के यशस्वी मनीषी हैं । उत्कलमणि प. गोपवन्धु दास महात्मा गांधी के सहकर्मी सत्याग्रही हैं । जेल में बंदी कवि की पंक्तियाँ मातृभूमि के लिए न्योछावर होने की प्रेरणा देती हैं : " मिसु मोरा देहे ऐ देशमाटी रे , देशवन्धु चली जांतु पिढी रे। " देश की समस्त भाषाओं के समान सिन्धी साहित्य गांधी के सन्दर्भों से भरा पड़ा है, किन्तु यह बड़ी विडंबना है कि सिन्ध अब हमारे देश का अंग नहीं रहा। देश विभाजन की दुखद त्रासदी मे हमने इसे पाकिस्तान के हाथों गंवा दिया । स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गांधी ने सात बार सिन्ध की यात्राएं की । अपनी आत्मकथा " मेरा देश, मेरा जीवन " में लालकृष्ण आडवाणी कहते हैं : " देश विभाजन के दुखद दौर मे जब सिन्धयों पर जुल्म ढाए जा रहे थे, महात्मा गांधी सदा उनके साथ खड़े रहे । " 30 जनवरी 1948, अपनी हत्या से कुछ घंटे पूर्व महात्मा गांधी का साक्षात्कार डा० चित्तराम गिडवानी के नेतृत्व में पीड़ित सिन्धयों के एक प्रतिनिधिमंडल से हुआ । अश्रुपूरित नेत्र, गांधी कहते हैं : " यदि कश्मीर के लिये पाकिस्तान के साथ युद्ध हो सकता है, तो सिन्ध के लिए क्यों नहीं ? " प्रोफेसर एन.आर. मलकानी, के.आर. मलकानी, लालकृष्ण आडवाणी, डा. चितराम गिडवानी, आचार्य जे. बी. कृपलानी के लेखन मे गांधी सर्वत्र व्याप्त हैं । भारतीय साहित्य पर महात्मा गांधी का प्रभाव "हरिअनंत हरिकथा अनंता " की भांति अनंत है । राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ' दिनकर ' की महात्मा गांधी को दी गई श्रध्दांजलि को उद्धृत कर मैं इस विषय का उपसंहार करता हूँ : "तू कालोदधि का महास्तंभ,आत्मा के नभ का तुंगकेतु बापू ! तु मर्त्य-अमर्त्य,स्वर्ग-पृथ्वी ,भू-नभ का महासेतु। तेरा विराट यह रुप , कल्पना पट पर नहीं समाता है । जितना कुछ कहूँ,मगर कहने को,शेष बहुत रह जाता है। लज्जित मेरे अंगार, तिलक, माँला भी यदि ले आऊं मैं , किस भांति उठूं, इतना उपर , मस्तक कैसा छू पाऊं मैं । ग्रीवा तक हाथ न जा सकते,उगलियाँ न छू सकतीं लालाट वामन की पूजा किस प्रकार, पहुंचे तुझतक मानव विराट। 🎂🎂🎂

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