* डा० विनोद कुमार तिवारी *
जम्बुद्वीप, भारतवर्ष, केदारखण्ड, नारद क्षेत्र, अलकन्दा-सरस्वती संगम तट, नर और नारायण पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य, श्री नारायण के घर-आंगन में , नारायण (पुरुषोत्तम)मास में , नारायण स्वरुप आचार्य प्रवर श्री अवधेशान्द जी महाराज के मुखारविन्द से श्री नारायण की कथा । इस दिब्य लग्न के भागी बनकर अभिभूत हैं हम । अन्तर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव , कुरुक्षेत्र सहित अनेक आयोजनों में स्वामी जी से आत्मीय साक्षात्कार होते रहे हैं, श्री बदरीनाथ जी के दर्शन भी पहले हो चुके हैं, किन्तु बदरीनाथ धाम में स्वामी जी का सानिध्य एक अनुपम संयोग है, बिल्कुल स्वर्ण में सुगन्ध जैसा ।
2012 की जेष्ठ मास में सम्पन्न हरमन्दिर साहब अमृतसर , वैष्णव देवी, फिर गंगोत्री , यमुनोत्री, केदारनाथ ,बदरीनाथ की वापसी यात्रा में ही अर्द्धांगिनी महोदया अल्पना जी रानी ने बदरीनाथ जी के पुन: दर्शन का संकल्प लिया था।
ज्यों ही उन्हें श्री गुरुजी महाराज के मुखारविन्द से बदरीनाथ धाम में श्रीमद्भागवद् कथा के आयोजन की सूचना मिली, उनकी खूशी का ठिकाना नहीं था। उन्होंने अविलम्ब पंजीकरण करा लिया। अपनी तक्नीक् व्यस्तताओं के वावजुद बालक अद्वैत वेदांत जयपुर से चलकर हमारे साथ हो लिए । हमलोग नई दिल्ली से चलकर ऋषिकेश पहुंचे। परमार्थ निकेतन में संध्या गंगा आरती में भाग लिया। अगले दिन बड़े सवेरे ऋषिकेश से चलकर अपरान्ह बदरीनाथ पहुंचे। लगभग सप्ताह भर का प्रवास । बदरी नाथ की प्रत्येक शीला , उससे जुड़े आख्यान , हर गली व गुफाओं से परिचित हुए हम।
देवतात्मा हिमालय का यह भाग भगवान शिव की भूमि होने के कारण केदार खंड कहलाता है। भगवान विष्णु ने इसे अपनी तप:स्थली बनाया। मानवता के कल्याण के निमित्त उन्होंने यहां कठोर तप किया। पूरा शरीर हिमाच्छादित हो गया। करुणा परायणा माता लक्ष्मी बड़ी द्रवित हुईं। स्वामी के शरीर को गलन से बचाने के लिए बदरी नामक एक स्थानीय वनस्पति (बेर या बेरी)से उनके उपर एक छत्र का निर्माण किया। बदरी या बदरीवन के स्वामी होने के कारण भगवान विष्णु बदरीनाथ कहलाए। बदरी तीर्थ का महात्म्य अनन्त है। स्कन्ध पुराण मे कहा है :
"बहुनि सन्ति तीर्थानि, दिविभूमौ रसासु च।
बदरी सदृशँ तीर्थँ न भूतौ, न भविष्यति ।"
कालान्तर मे चीनी दस्युओं के भय एवं आतंक से भगवान के विग्रह को अलकनन्दा के नारदकुंड मे छिपा दिया गया।
भगवान शिव जब आदि शंकराचार्य के रूप मे अवतरित हुए , वह केरल से चलकर यहां आए, एवं विग्रह की पुनर्प्रतिष्ठा की। जगत्गुरु शंकराचार्य महाराज ने देश के चारों कोने पर चार मठों, (धामो) की स्थापना की और भारत वर्ष की राष्ट्रीय एकता को सुनिश्चित किया।
बदरी विशाल के वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण पन्द्रहवीं शताब्दी मे श्री रामानुजीय परम्परा के स्वामी वरदाचार्य की प्रेरणा से श्रीमान गढवाल नरेश ने करवाया। तदनन्तर इन्दौर की महारानी अहिल्याबाई ने भगवान को स्वर्ण छतरी तथा मंदिर को स्वर्ण कलश भेंट किया।
भगवान बदरीनाथ का मंदिर बड़ा भव्य व कलात्मक है। सिंहद्वार, सभामण्डप व गर्भगृह इसके तीन भाग हैं। सिंह द्वार बड़ा चित्रात्मक है। अलकनंदा पर बने पदसेतु से चलकर सीढियों से चढ़कर सिंहद्वार पहुचते हैं। सिंह द्वार पर सुशोभित विशाल घंटा पारा मिलिटरी फोर्स गढवाल राइफल्स द्वारा का भेंट किया गया है। सिंहद्वार से प्रवेश कर सभा मंडप मे आते हैं। 1978 मे सभा मंडप को बड़ा बनाया गया, जिससे देश भर से आए हजारों यात्रियों का मंदिर मे समायोजन हो सके । बदरीनाथ मंदिर के प्रधान पुरोहित दक्षिण भारत के चित् पावन नम्बुदरी ब्राह्मण श्री मान रावल जी ने बताया कि मंदिर का गर्भ गृह अपनी मूल स्थिति मे है। यह बाहर से 17 फीट 5 इंच लम्बा 15 फीट चौड़ा है, तथा अन्दर से 13 फिट लम्बा तथा 8 फीट 10 इंच चौड़ा है। गर्भ गृह की मोटी दीवारें इसे सम्बल प्रदान करतीं हैं।
हिमालय की औषधिय जड़ी बुटियों तथा पुष्पहारों से गर्भ गृह को सुसज्जित तथा सुरभित किया जाता है। चराचर जगत के परमपिता यहीं पद्मासन मे विराजमान हैं। जैन वन्धु इनमें ऋषभदेव व भगवान पार्श्वनाथ की छवि देखते हैं, तो बौद्ध करुणा पारायण भगवान बुद्ध की। गुरु गोविन्द सिंह जी की तप:स्थली हेमकुण्ड साहेब के दर्शन को आया कोई सिक्ख बिना इनके दर्शन के नहीं लौटता क्योंकि ये ही उनके अकाल पुरुष हैं। यही हमारी राष्ट्रीयता का एकात्मता मंत्र है :
"यं वैदिका: मंत्रदृश: पुराणा:,
इंद्रम यमम् मातरिश्वान माहु:,
वेदान्तिनो निर्वचनीय मेकं,
यं ब्रम्हशब्देन विनिर्दिशन्ति:
शैवा यमिशं शिव इत्यवोचन,
यं वैश्नवा: विष्णुरीति स्तुवन्ति,
बुद्धस्तथा अहर्नीति बौद्धजैना
सत्श्रीअकालेति च सिक्ख सन्त:
शास्तेति केचित कतिचित कुमार:,
स्वामिति मातेति पितेति भग्त्या,
यं प्रार्थयन्ते जगदीशीतारं ,
स: एक एव प्रभु: अद्वितीय: "
देवर्षि नारद इनके प्रथम अर्चक हैं, इसलिए यह नारद क्षेत्र कहलाता है। सभा मंडप मे गर्भगृह से बाहर वायीं ओर माता लक्ष्मी विराजमान हैं। यहाँ वह नारायण की वामांगी नहीं, अपितु योगमुद्रा मे स्थित हैं। पीछे भगवान शंकराचार्य तथा दायीं ओर हनुमानजी तथा दिक्पाल घंटा कर्ण का दर्शन किया जा सकता है। मुख्य मन्दिर तथा अलकनन्दा की तेज धारा के बीच बने प्लेटफौर्म पर नारद , नृसिंह , वाराह , गरुड़ , और मारकण्डेय नाम की पँचशिलाएँ है तथा सबकी अपनी अपनी पौराणिक कथाएं तथा महात्म्य है। यहीं पर तप्तकुण्ड है। ठंड से सिहरते हुए इस कुण्ड मे स्नान बड़ा सुखदायक तथा पुण्यदायी है। नर पर्वत पर शेषनेत्र स्थित है।
बदरीनाथ मंदिर से तीन किलोमीटर उत्तर देश का अन्तिम गांव मणिभद्रपुर अर्थात माना गांव स्थित है , यहीं काफी उचाई पर भगवान वेदव्यास तथा गणेश जी की गुफाएं हैं।
यहीं रहकर उन्होंने वेदों का विन्यास किया, इसकारण वह वेदव्यास कहलाए। वह महर्षि परासर के पुत्र हैं तथा उनका मूलनाम कृष्ण द्वैपायन है। यहीं रहकर उन्होंने श्री मदभागवत तथा महाभारत जैसी महान कृतियों का प्रणयन किया। कहते हैं कि ब्रह्मा जी ने ही उन्हें
इस महान कार्य के लिए श्री गणेशजी जैसे तेजस्वी पुरुष को आशुलिपिक के रूप में रखने का परामर्श किया था। वेदव्यास ने श्री गणेश जी का ध्यान किया। वह उपस्थित हुए। दोनों के बीच पहले शर्तें और फिर सहमति यह बनी कि वेदव्यास बिना रुके हुए बोलेंगे तथा श्री गणेश एक शव्द भी बिना समझे हुए नहीं लिखेंगे। इस प्रकार इन कृतियों का सृजन संभव हुआ। महाभारत के सन्दर्भ मे यह कहा जाता है कि जो विषय यहां है, वही सर्वत्र है तथा जो यहाँ नहीं है वह कहीं नहीं है। महर्षि वेदव्यास ने किसी विषय को छोड़ा ही नहीं है इसलिए ठीक ही कहा है कि "व्यासोश्च्छिष्टं जगत सर्वं " अर्थात अध्ययन के सारे विषय व्यासजी के जुठन हैं। दोनो गुफाओं मे जाकर हमनें इन मनीषियों को प्राणिपात किया। नीचे उपत्यका मे यहीं भीमसेतु है। कहते हैं स्वर्गारोहण के समय एक बड़ी जलधारा पर एक विशाल चट्टान रखकर भीम ने एक सेतु निर्माण किया तब पाण्डव माता के साथ इस सेतु को पार किए तथा वसुधारा की ओर आगे बढ़े । यहीं सरस्वती का उद्गम स्थल है। विशाल पर्वत को चीरकर उद्याम प्रवाह से वह निकलतीं हैं तथा तीन सौ मीटर आगे चलकर अलकनंदा में मिलकर अन्त:सलीला हो जाती हैं । यह स्थान केशव प्रयाग कहलाता है। देश के आखिरी चाय दुकान पर काफी की चुस्कियां लेते हुए हमलोगों ने सरस्वती को प्रणाम किया । अलकनंदा भगवान विष्णु के चरणों को स्पर्श करती हुई आगे बढती हैं , इसलिए वह विष्णुपदी कहलाती हैं। आगे वह रुद्रप्रयाग मे केदारनाथ से आती हुई मंदाकिनी से मिलती हैं , फिर देव प्रयाग मे गंगोत्री से आती हुई भगीरथी से मिलकर गंगा मइया कहलाती हैं।
वापसी यात्रा मे हम लोगों ने जोशी मठ के नृसिंह मंदिर की संध्या आरती मे भाग लिया। शीत, शिशिर, और वसंत ऋतुओं मे जब बदरीनाथ क्षेत्र हिमाच्छादित रहता है और बदरीनाथ मंदिर के कपाट वन्द हो जाते हैं , तब देवोत्थान एकादशी ( कार्तिक शुक्ल 11 , नवंबर ) से अच्छय तृतीया ( वैशाख शुक्ल 11, अप्रैल ) के पूर्व तक भगवान का प्रवास यहीं होता है । फिर हमलोग आदि शंकराचार्य महाराज के द्वारा स्थापित श्री ज्योतिर्मठ गए तथा उनकी विभूति को प्राणिपात कर कृतकृत्य हुए । मुझे जगत्गुरु की कृतियों पर भाष्य करने की उत्कण्ठा है, मैं समझता हूँ बहुत शीघ्र मैं ऐसा कर पाउंगा । जोशीमठ के गुरुद्वारे मे रात्रि विश्राम हुआ । गुरुद्वारे के मुख्यग्रंथी महाराज ने पुनः पधारने का निमंत्रण देकर अभिभूत कर दिया ।
बदरीनाथ की पावन भूमि पर जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद जी महाराज के मुखारविंद से 16 से 22 मई 2018 तक श्री मद् भागवद कथामृत का पान किसी महायज्ञ के महाप्रसाद ग्रहण करने जैसा अनुभव रहा। पूज्यपाद आचार्य प्रवर स्वामी जी
महाराज जगतगुरु आदि शंकराचार्य की परंपरा के वेदांती सन्यासी हैं । उनके विशाल व्यक्तित्व मे आदि शंकराचार्य तथा स्वामी विवेकानंद का अभिनव समाहार है ।
उनके प्रत्येक शव्द व वाक्य मे मानवता का उन्नयन तथा राष्ट्र को परम वैभव तक ले जाने का सन्देश है। श्री मद्भागवत कथा के पूर्व का मंगलाचरण वह भारत माता की वन्दना से करते हैं :
"नमस्ते सदा वत्सले मातृ भूमे,
त्वचा हिन्दु भूमे सुखम वर्धितोहम्
महामंगले पुण्य भूमि त्वदर्थै,
पतत्वे सकायो नमस्ते, नमस्ते ।"
यही तो राष्ट्र दर्शन का मूल मंत्र है। ऋषि बंकिम चन्द्र चटोपाध्याय कृत वन्देमातरम् गीत की पंक्तियाँ हैं :
" तुमि विद्या दशप्रहरणधारिणीम्
कमला कमलदल विहारिणीम्
वाणी विद्या दायिणीम्
णमामि त्वाम्, णमामि कमलाम् ,
अमलाम् , अतुलाम् , मातरम्
+++ +++ +++
तोमारायी प्रतिमा गड़ी मन्दिरे, मंदिरे "
( हे भारत माता! तुम ही दुर्गा हो, तुम ही लक्ष्मी हो
तुम ही सरस्वती हो तुम्हारी प्रतिमा भारत वर्ष की हर मन्दिरों मे स्थापित है, हे मा हम तुम्हारी वन्दना करते हैं।)
ईशावासोपनिषद मे कहा है: "ईशावासंइदंसर्वं यत्किंचित जग्त्यामअजगत" अर्थात समस्त विश्व ईश्वर का अभिव्यक्त रुप है। स्वामी जी 'भगवान' शव्द की व्याख्या प्रकृति के पँच तत्वों के समाहार के रुप मे करते हैं: भ = भूमि, ग = गगन, व = वायु , अ = अग्नि, न = नीर अर्थात जल । वह कहते हैं कि प्रकृति के इन पँच अवदानों का संरक्षण ही नारायण की पूजा है।
स्वामी कहते हैं कि आध्यात्म या आध्यात्मिक होने का अर्थ किसी पूजा , व्रत अनुष्ठान करना या किसी अप्राप्य को प्राप्त करना नहीं, अपितु अपनी मूल, स्वाभाविक प्रकृति मे लौटने से है। यह मूल प्रकृति सच्चिदानन्द अर्थात सत् चित् आनंद truth, consciousness and bliss का समाहार है । श्वेताश्वतर उपनिषद की पंक्तियां हैं:
" शृन्वतुँ विश्वे अमृतस्य पुत्रा:
आ ये धमाणि दिव्याणि तस्थु:
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम ,
आदित्य वर्ण्यं तमस: परस्तात ,
तमेव विदित्वा अति मृत्युमेति ,
नान्य: पन्था विद्यतेअनाय "
इसके हिन्दी पद्यानुवाद की मेरी पंक्तियाँ हैं:
"सुनो ! सुनो !! अमृत के पुत्रों,
हे ! दिव्य धाम के वासी ,
मैंने उसको जब जान लिया,
कैसी तब शेष उदासी ?
अग्यान तिमिर से दूर, पुरातन,
पुरुष , नित्य माया से परे,
उसे जानकर ही हो सकते,
मृत्यु पंथ से मुक्त अरे । "
गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज रामचरितमानस मे इसी बात को भगवान राम के मुख से कहलवाते हैं :
"ईश्वर अँश जीव अविनाशी,
चेतन, अमल, सहज सुखराशि "
स्वामी विवेकानंद ने शिकागो विश्व धर्मंसंसद , अमेरिका मे इसी बात को यों कहकर सबको अभिभूत कर दिया :
" Ye, are children of God, sharer of immortal bliss, holy and perfect beings. You are divinities on this earth. Sinners? It's sin to call a man so. You are souls, spirit, free, blest and eternal."
सात दिन मे अपने 21 घंटे के व्याख्यान मे वेद, वेदांत, उपनिषद , रामायण , गीता, महाभारत, श्री मदभागवत, कला, विग्यान , वाणिज्य, दर्शन का शायद ही कोई विषय हो, जिसका उन्होंने स्पर्श नही किया। यह प्रसंग "हरि अनंत हरिकथा अनंता" की भाँति अनंत है । मैं भला यह कैसे कह सकता हूँ कि इस लघु आलेख मे मैं सबकुछ कह पाया हूँ।
इस महती आयोजन में प्रतिदिन अगणित गण्यमान्य जनों का आगमन होता रहा। स्वामी रामदेव जी महाराज, स्वामी चिदानंद जी महाराज, रामकथावाचक श्री मुरलीधर जी महाराज , केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री , कई राज्यों के मुख्यमंत्री तथा मंत्री , भाजपा तथा कांग्रेस के अधिकारियों के अतिरिक्त सैकड़ो सामाजिक व साँस्कृतिक कार्यकर्ताओं की गरिमामयी उपस्थिति रही । यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के अनुज श्री पंकज मोदी जी की सादगी व विनम्रता का मैं कायल हूँ , उन्होंने बड़े उत्साह पूर्वक मुझे गुजरात आने का निमंत्रण दिया।
श्री मद् भागवद कथा की आयोजक व मुख्य यजमान श्री मती अंगुरी देवी जी जो दक्षिण अफ्रीका की अनिवासी भारतीय है , ने चारो धाम मे इस तरह की कथा का आयोजन किया है । उनका यह पुनितकृत्य सचमुच अभिन्दनीय है ।
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