Wednesday, 19 December 2018

रमाबल्लभ तिवारी : एक अप्रतिम मनीषि

   
              डा० विनोद कुमार तिवारी
      " जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु , ध्रुवं जन्ममृतस्य च
        तस्मात् परिहार्येअर्थं , नत्वं शोचितुमर्हसि । "
                --- श्रीमद्भागवतगीता, द्वितीय अध्याय , 27
अविभाजित पलामू जिले (सम्प्रति पलामू ,गढ़वा, लताहार तीन जिले हैं तथा मेदिनीनगर पलामू प्रमंडल का मुख्यालय है) की समृद्ध विद्वत परंपरा के अप्रतिम मनीषि तथा मेरे परम आत्मीय काका श्री रमावल्लभ तिवारी जी के दिवंगत होने का समाचार देश विदेश मे विखरा उनका विराट शिष्य मंडल सहज विश्वास नहीं कर पा रहा है। रात में अम्बाला छावनी परिषद्  के एक बड़े सेना अधिकारी का फोन आया । वह बड़ी असहज भाव से मुझसे इस प्रथम सूचना की सम्पूष्टी चाह रहे थे । मैने विनम्रतापूर्वक कहा कि इस तरह की सूचनाएं प्रायः असत्य नहीं होतीं।
स्वातंत्र्योत्तर भारत का प्रथम दशक । राष्ट्र निर्माण के प्रति अदम्य उत्साह का वातावरण ।  देश के कोने-कोने मे शिक्षण संस्थानों की स्थापना हो रही थी। पलामू जिला मुख्यालय मेदिनीनगर (तब डालटनगंज ) मे गणेश लाल अग्रवाल महाविद्यालय की स्थापना हुई । यह एक सुखद संयोग है कि रमणीक नेतरहाट पठार पर विश्वप्रसिद्ध नेतरहाट आवासीय विद्यालय (जिसमें अध्यापन का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ), की स्थापना वर्ष 1954 मे ही उच्च विद्यालय लेस्लीगंज की स्थापना हुई । श्री मान रमा बल्लभ तिवारी इसके संस्थापक प्राचार्य हुए । यह कंटकाकीर्ण कीरिट था । यह पद नहीं अपितु झंझावातों में दीपक की लौ को संजोए रखने का दायित्व था । उन्होंने एक कुशल खेवैय्या  की भांति कश्ती को तूफान से बाहर निकाला तथा विद्यालय को जिले तथा विहार विद्यालय परीक्षा समिति में एक विशिष्ट पहचान दिलाई । लगभग  साढ़े तीन दशक के सेवाकाल में विद्यालय के गौरव को शिखरस्थ उचाई  तक ले जाने में उन्होंने कोई श्रम शेष नहीं रखा ।
कठिन परीश्रम, दृढसंकल्प, लक्ष्य के प्रति अर्जुन-दृष्टि तथा कड़ा अनुशासन उनके प्रशासकीय व्यक्तित्व के विविध आयाम थे । वह आजीवन "परम् वैभवम् नेतुमेतत्
स्वराष्ट्रम् " के दृढ़ब्रती रहे ।लेकिन प्रशासकीय दृष्टि से कठोर होने के वावजूद वह हृदय  से नवनीत के समान कोमल थे । इक्ष्वाकु वंशीय भगवान श्रीराम के चरित का आख्यान करते हुए आदि कवि बाल्मीकि से महर्षि नारद करुणा , दया, उदारता इत्यादि जिन मानवीय गुणों का वर्णन करते हैं , श्री रमाबल्लभ तिवारी उनके जीवंत प्रतिमान थे । "वज्रादपि कठोरानिमृदुनिकुसुमादपि " की उक्ति महाकवि भवभूति द्वारा ऐसे ही महापुरुष के सन्दर्भ मे कही गई है।  उनके जीवन व दर्शन को समझने के लिए उच्च विद्यालय की प्रातः कालीन सभा मे नित्य गाए जाने वाले उनके द्वारा चयनित विद्यालय गीत (प्रार्थना) के हर पंक्ति के प्रत्येक शब्द पर मनन कीजिए । शक्ति की अराधना क्यों ? देश उत्थान के लिए । उस विद्या का क्या प्रयोजन ? जो विनयी न बनाय तथा अपनी संस्कृति से प्यार करना न सिखाय । वह धन व वैभव कैसा ? जो देश व मानवता के लिए अर्पित न हो । उद्धरण देखिए :
" प्रभो शक्ति  दो हमें , देश  उत्थान  करें  हम ,
  निज भाषा , निज देश, वेश का मान करें हम,
  विद्या पढ़ें ,  विनम्र  बने ,      विनयी कहलाएं,
   सत्य , अहिंसा, न्याय, धर्म  पालक  बन जाएं,
   हो न हमें अभिमान, ग्यान - विद्या - वैभव का ,
   तन,मन,धन परजनहितजनहित हों सर्वस्वहमारे।"
प्रखंड मुख्यालय होने के कारण लेस्लीगंज प्रशासनिक, कानुन- व्यवस्था, चिकित्सा, बैंक, बाजार, सामाजिक आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक दृष्टि से  लगभग सौ ग्रामों का केंद्र रहा। किसी भी गांव का कोई भी व्यक्ति अक्षम, असमर्थ, किसी भी सहायता की अपेक्षा से उनके पास आता वह बिना किसी भेद भाव के अहर्निश सहयोग के निमित्त तत्पर रहते । इन्हीं मानवीय गुणों के कारण उनके वैचारिक विरोधी भी उनके कायल होते।
याद कीजिए साठ व सत्तर का दशक ।  1962, 65 तथा 71,  नौ वर्ष में देश को तीन युद्धों का सामना करना पड़ा ।
अपनी बहादुर सेना की महान गाथाओं से आम जन को अवगत कराने के लिए आज के समान न तो टीवी चैनल थे, न ही समाचार पत्रों का समुचित प्रसार । प्रसारण मंत्रालय द्वारा निर्मित डोक्युमेंटरी फिल्में कस्बों, प्रखंड मुख्यालयों मे भेजी जाती थीं। जब ये फिल्में लेस्लीगंज पहुंचती, उच्च विद्यालय इसका नोडल केंद्र बनता तथा वह बड़ी दक्षता पूर्वक देश के प्रति मर मिटने का जज्बा गांव - गांव तक पहुंचाते । विगत पांच दशक में देश मे जो भी राष्ट्रीय व सांस्कृतिक पुनर्जागरण हुआ श्री रमाबल्लभ तिवारी इसे यथार्थ की धरा पर उतारने वाले महाराज भगीरथ बने । लेस्लीगंज मे आयोजित किसी भी राष्ट्रीय व सांस्कृतिक समारोह के वह पितृपुरुष होते । कोई भी विधायक या सांसद या मंत्री या गण्यमान्य व्यक्ति यदि लेस्लीगंज पहुचता तो पूरे लाव लस्कर के साथ उसका गन्तव्य उच्च विद्यालय होता तथा प्राचार्य के समक्ष विनयावनत होता । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व उसकी अनुसांगिक संस्थाएं उनके अभिभावकत्व में पुष्पित व पल्लवित हुईं । उन्होंने दशकों तक  कोपरटिव सोसायटी  का सफलतापूर्वक संचालन कर सहकार व स्वदेशी का संदेश दिया। अपने गांव में चर्मशिल्पकार वन्धुओं को ढोल, ढाक, सिंगा, डफलाबासुरी ,बैंड बाजा इत्यादि लोकवाद्य उपलब्ध कराया तथा उन्हें सामाजिक सम्मान तथा आर्थिक सशक्तिकरण प्रदान किया । उनके सहोदर भाई तथा भारतीय वांगमय के अधिष्ठात्री विद्वान श्री दामोदर तिवारी जी कहते हैं,  "बल्लभ भाई ललित कला तथा संगीत के बड़े सम्पोषक थे। वह जब स्वयं कीर्तन मंडली में बैठते तो कुशल ढोलक वादन तथा गायन से दर्शकों को मुग्ध कर देते । उन्होंने दर्जनों संस्थाओं की स्थापना ,संरक्षण व निर्देशन किया । वह अपने आप मे स्वयम् एक संस्था थे।"
श्री रमाबल्लभ तिवारी का जन्म 25 जनवरी 1930 को जिले के प्रसिद्ध जामुन्डीह ग्राम मे  हुआ । पिता प० श्री बुद्धनन्दन तिवारी जी यशस्वी आचार्य तथा माता श्री मती मोतीदेवी धर्मपरायना महिला थीं। उनके सभी बड़ेभाई श्री विश्वनाथ तिवारी(मानवता सेवा), डा० रघुनाथ तिवारी 'वैद्यजी' (चिकित्सा सेवा),श्री लोकनाथ तिवारी(राजनीति), अनुज श्री रामस्वरूप तिवारी(समाज सेवा), भगिनि मुखवती देवी (गृहिणी) विविध सेवाक्षेत्रों मे समय रुपी रेत पर पांव के निशान छोड़ गए हैं। सम्प्रति उनकी सहधर्मिणी  श्री मती बिमला देवी, पुत्र डाक्टर अरविन्द , सुशीलजी, सतीशजी, अजीतजी, पुत्री सरिता जी, वरुण जी, (पौत्र) के अतिरिक्त सभी भाइयों के पुत्र ,पौत्र, पौत्रियों का बट्बृक्ष सा विशाल सुखी सम्पन्न संयुक्त परिवार है । परिवार के सभी सदस्य श्री रमाबल्लभ तिवारी जी के उज्जवल चरित्र के अभिमानी तथा उनकी विनम्रता, सौम्यता, उदारता के सच्चे प्रतिनिधि हैं ।
श्री रमाबल्लभ तिवारी के अभिन्न मित्र व यशस्वी राजनेता श्री इन्दरसिंह नामधारी कहते हैं, " श्री रमाबल्लभ जी  स्वतंत्रता संग्राम के भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों वाली पीढ़ी को वर्तमान युवा पीढ़ी से जोड़ने वाले महासेतु थे। शिक्षा व संस्कृति के क्षेत्र में उन्होंने जो प्रतिमान स्थापित किया है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा व पाथेय बना रहेगा।"  यह बड़ी हर्ष का विषय है कि उनके जेष्ठपुत्र डॉक्टर अरविन्द , जो रांची मे लब्धप्रतिष्ठित कायचिकित्सक हैं ने अपने पिता की स्मृति में  मैट्रिक बोर्ड परीक्षा में सम्पूर्ण लेस्लीगंज प्रखंड में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाले तीन मेधावी विद्यार्थियों  को "श्री रमाबल्लभ तिवारी स्मृति सम्मान" प्रारंभ करने की घोषणा की है। डाक्टर अरविन्द ने यह भी कहा कि लेस्लीगंज स्थित उनके आवास के एक भाग को "रमाबल्लभ तिवारी प्राच्यविद्या शोध संस्थान" के रुप में विकसित किया जाएगा , जिसके ग्रंथागार में  हजारों सन्दर्भ ग्रंथों होंगे, जो किसी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से संवद्ध होगा तथा जहां भारतीय वांग्मय पर शोध किया जा सकेगा ।
श्री रमाबल्लभ तिवारी जी की कीर्ति कथा अनंत है। मेरा  संकट यह है कि जिस विषय पर विशाल स्मारक ग्रंथ लिखा जा सकता है , मैं एक लघु आलेख मे क्या लिखूं ।
मैं क्या भूलुं ? मैं क्या याद करूँ? हिन्दी कविता की इन सुन्दर पंक्तियों को उद्धृत कर मै उनके चरण कमलों मे श्रध्दांजलि अर्पित करता हूँ :
"तुम अजातअरि लोक-संग्रही , राष्ट्रशक्ति के वलयकोण थे,
देव बता दो प्रतिपक्षी भी ,क्यों इतने संतुष्ट मौन थे,
सुनकर पावन चरित तुम्हारा, कोटि हृदय प्रस्तर पिघले हैं, आज तुम्हारी पूजा करने सेतु-हिमालय संग मिले हैं ।
लो श्रध्दांजलि राष्ट्र पुरुष सत् कोटि हृदय के कंज खिले हैं।"
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