"कर्पुरगौरं, करुणावतारं, संसारसारं भुजगेन्द्र हारं |
सदावसंतं, हृदयारवृन्दे, भवम् भवानिसहितंणमामि ||"
यदि आपने गंगोत्री , यमुनोत्री , केदारनाथ , बदरीनाथ की यात्राएं नहीं की है, यदि आपने "सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्री शैले मलिकार्जुनियम् +++ सेतुवंधे तु रामेशं +++वाराणस्यां तु विश्वैसं +++ एतानि ज्योतिर्लिगानि" के दर्शन नहीं किया है , तो जामुन्डीह पधारिए । यदि आपने ये यात्राएं कर ली है , तो भी आपका यहां स्वागत , अभिन्दन है ,क्योंकि यहां आकर आपके तीर्थयात्राओं की पूर्णाहुति होगी । यहां अभी-अभी काशीविश्वनाथ एवं भगवान शिव के सभी रुपों के आंचलिक पीठ की स्थापना हुई है। "जामुन्डीह में आन विराजे काशी के अधिशासी" । जामुन्डीह ग्राम पूर्वी भारत के झारखंड प्रदेश के पलामूं जिले में मुख्यालय मेदिनीनगर से हजारीबाग मार्ग पर 22वें किलोमीटर पर स्थित है। मेदिनीनगर (पूर्व नाम डालटनगंज) देश की राजधीनी नई दिल्ली , कलकत्ता , पटना , रांची, धनबाद , वाराणसी , प्रयागराज , लखनउ , भोपाल, जम्मू, अमृतसर, पठानकोट इत्यादि शहरों से रेल मार्ग से सीधा जुड़ा है । शेष नगरों/ महानगरों से वाया रांची , व धनबाद जुड़ा है । यदि आप विमान यात्री हैं, तो निकटतम विमानतल रांची है। यदि आप अति विशिष्ट भद्रलोक हैं, तो आपका विमान मेदिनीनगर स्थित चियांकी विमानतल पर भी लैंड कराया जा सकता है। त्रिदिवसिय प्राणप्रतिष्ठा समारोह में देशविदेश के हजारों भद्र जनों की सक्रिय सहभागिता बड़ी अल्हादकारी रही। यज्ञ का श्रीगणैश कलशयात्रा से हुआ। आबालवृद्ध हजारों नर नारियों ने गंगासदृशा अमानत नदी के मणिकर्णिका घाट से जल भरकर अपने -अपने कलशों की स्थापना की । रात्री में आयोजित रामधुन अखंडहरिकीर्तन में दर्जनों ग्राम मंडलियों की प्रतिभागिता बड़ी हर्ष दायी रही । द्वितीय दिवस भगवान काशीविशवनाथ को सुसज्जित रथों में बिठाकर नगरभ्रमन कराया गया , तथा पूर्ववर्ती देव अधिष्ठानों , सप्तमातृकाओं से भगवान का साक्षात्कार हुआ। तृतीय दिवस प्राण प्रतिष्ठा , फिर प्रभू का रुद्राभिशेक, इसके पश्चात हवन यज्ञ एवं फिर महाआरती । भंडारे, लंगर में ग्राम तथा परित: गांवों के हजारों लोगों ने काशीविश्वनाथ भगवान का महाप्रसाद छका। मेरे प्रिय भईया, श्री निर्मल कुमार तिवारी जी , जो अभी-अभी महाविद्यालय के प्राचार्य पद से निवृत हुए हैं ने अपने पूर्वजों की महान विरासत एवं "कामये दुख तप्ताणां प्राणिणाम् आर्तिनाशनम्"(What do I desire is the redemption of the grief of the grief-strikken humanity... महाभारत में महाराज रन्तिदेव का कथन) की प्रेरणा से उन्होंने काशीविश्वनाथ की स्थापना का संकल्प लिया। संकल्प से सिद्धि की यात्रा में वह स्वयं अपनी अर्द्धांगिणी, पूत्रों व वधुओं के साथ यज्ञ के आयोजन ,संयोंजन एवं यजमानत्व की केन्द्रीय भूमिका में रहे। जामुन्डीह मेरी जन्मभूमि है ....
"इसकी रज में लोट-लोट कर बड़ा हुआ हूं । घुटनो के बल सरक -सरक खड़ा हुआ हूं ।
_मैथिलीशरण गुप्त
इसे मैं तबसे देखता रहा हूं , जितनी हमारी उम्र है। स्थानीय विद्यालय के तत्कालीन गुरुजी के चरणों में बैठकर हमारी प्राथमिक शिक्षा हुई। यहां का सामाजिक सौहार्द, ब्राह्मणों एवं हरिजन(रामचरित मानस से उद्धृत महात्मा गांधी द्वारा दलितों को प्रदत सम्मानपूर्वक सम्बोधन) भाइयों के बीच मधुर सम्बन्ध (congiality) विहार, उत्तर प्रदेश , हरियाणा जैसे प्रदेशों जहां से जातीय हिंसा की दुखद समाचार आते हैं ,के लिए एक प्रेरणा की की बात है । मैं समझता हूं आदिशंकराचार्य महाराज के "न में जाति भेदा, न में मृत्यु शंका +++ चिदानन्द रुपं शिवोहं, शिवोहं" तथा स्वामी विवेकानन्द ..." वे ,(चर्मशिल्पकार , कास्तकार,जुलाहे, अनुसूचित जाति जनजाति संवर्ग की सभी जातियां) हमारे रक्तवन्धु ( blood brother) हैं" के आदर्शों का सम्पूर्ण अनुपालन हमारे ग्राम समाज में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। हम शादी विवाह से लेकर हर समारोह में अपने आंगन में अपनी पंक्ति में बैठाकर बड़ी प्रीतिपूर्वक उन्हें भोजन कराते हैं ,उनके परिवार के योगक्षेम की चिंता करते हैं, और वे हमारे मानप्रतिष्ठा की रक्षा में दिन रात का अन्तर नहीं समझते। बारात प्रस्थान इत्यादि विशेष अवसरों पर पर जब सभी पुरुष बाहर चले हैं, और घर पर केवल महिलाएं माताएं व वहु बेटियां ही रह जातीे हैं तो हवेली की अस्मिता की रक्षा का दाईत्व ये ही वन्धु सम्हालते हैं किन्तु तब हम इन्हें शस्रधारी बना देते हैं। (शस्त्रधारियों में मैं राम हूं.. श्री मद्भगवद्गीता)। (कृपया सुनिए You Tube पर उपलव्ध श्रीमान अटल विहारी वाजपेयी का स्वातंत्र्य वीरसावरकर पर दिया गया वह व्याख्यान ,जिसमें वह पीड़ा पूर्वक कहते हैं कि काश! हमने इन्हें यदि शस्त्र उठाने का अधिकार दिया होता , तो हमारा सोमनाथ नहीं लुटता । अगर ये शस्त्रधारी होते ,तो अयोध्या, मथुरा , काशी के हमारे मानविन्दु ढहाए नहीं जा पाते।) प्राणप्रतिष्ठा समारोह में विशेषकर कलश यात्रा तथा शोभायात्रा में सैकड़ों की संख्या मे हरिजन वन्धुओं , उनकी वहुबेटियों की उत्साह पूर्वक सहभागिता देखकर मैं अभिभूत हुआ , तथा अपने ग्राम की गौरवपूर्ण परंपरा देखकर बड़े गौरव की अनुभूति हुई । भगवान शिव समस्त मानवता के कल्याण के देवता हैं । वह देवाधिदेव हैं। गुरुगोविन्द सिंह महाराज ने यवनों से धर्मयुद्ध में विजय के लिए भगवान शिव की अराधना की है। (देहि शिवा वर येही मोहे, निज कर्मन ते कबहुं न डरौं) आज भी हमारी सेना रण में या अगले मोर्चे पर प्रस्थान से पूर्व भगवान शिव की पूजा, आरती तथा हर हर महादेव के जयकारे के पश्चात ही करती है । "हरहर महादेव" और "शिवाजी महाराज की जय" तो मराठा रेजिमेंट का युद्ध उदघोष (war cry)ही है । रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी सम्मानित कृति "संस्कृति के चार अध्याय" में दर्जनों सन्दर्भों से स्थापना की है कि भोले शंकर वनवासियों , आदिवासियों के अधिष्ठात्री देवता हैं । यदि आप दिल्ली आएं , तो लक्ष्मीनारायण (विड़ला) मंदिर का दर्शन करना बिल्कूल ना भूलें । उसके दिवारों पर भारतीय वांगमय से सेकड़ो भीत्तिलेख खुदें हैं। अनुवाद सहित फारसि में लिखे इस पंक्ति में हजरत मोहम्मद के चाचा भगवान शिव से यह प्रार्थना करता है कि उसका अगला जन्म भारतवर्ष में हो। इस तथ्य पर चिंतन व निष्कर्ष निकालने की स्वतंत्रता मैं आपको प्रदान करता हूं । भगवान शिव के कल्याण का कैनवास मानवों तक ही सीमित नहीं है । वह पशुपति नाथ हैं। समस्त जीवजन्तुओं , पशुपक्षियों , गोवंश संरंक्षण (उनका प्रिय वाहन नंदी गोमाता का पुत्र है), सरिता वन प्रांतर गिरि कंदराअओं , सम्पूर्ण पर्यावरण के संरक्षक अधिष्ठाता हैं। पृथ्वी पर गंगा जी के अवतरण की कल्पना भगवान शिव की अनुकम्पा के बिना सम्भव थी क्या ? उन्होंने स्वर्ग से उतरी गंगा को अपने जटाजुट में धारण कर उसके उद्याम प्रवाह को मंद किया , तथा गंगावतरण को सहज बनाया। भगवान शिव रामायण के आविष्कर्ता , रचयिता तथा प्रथम वक्ता हैं (रचि महेश निज मानस राखा, पायी सुसमय उमा संग भाखा ...रामचरित मानस) । भगवान राम तथा भगवान शिव में अन्योनाश्रय सम्वन्ध है।दोनों एक दूसरे के आराध्य तथा अराधक भी हैं। भगवान राम ने लंका प्रस्थान से पूर्व भारत वर्ष के दक्षिणी छोर पर भगवान शिव को स्थापित किया जो रामेशवरम् ज्योतिर्लिग बना। लगभग महीने भर पूर्व प्रकाशित अपने आलेख "आदि शंकराचार्य के देश में" में मैंने भगवान राम व शिव के अनन्य सम्बन्धों का विशद विवेचन किया है , जिसे मेरे blog .. Gandhi Geeta Foundation एवं Facebook post पर पढ़ा जा सकता है। भगवान शिव समस्त ज्ञान , विज्ञान, देवनागरी लिपि , भाषा साहित्य , व्याकरणशास्त्र , संगीतशास्त्र , योगशास्त्र , नाट्यशास्त्र के प्रथम आचार्य हैं। वह समस्त जगत के माता पिता हैं ( जगत पितरौ वन्दे पार्वति परमेश्वरौ ...महाकवि कालिदास ) भगवान शिव भरतीय राष्ट्रीयता के जिवन्त प्रतिमान हैं । उनकी जीवन्त उपस्थिति कैलाश से कन्याकुमारी तथा कक्ष से कोहिमा तक अनुभव किया जा सकता है । सम्पूर्ण भारतवर्ष भगवान शिव से आप्यायित है। वह भारतवर्ष के सूक्ष्म रुप हैं। भारतवर्ष उनका प्रकट,स्थुल रुप है । भारतीय स्वतंत्रतासंग्राम के कालखंड में लिखी हिमालय को सम्वोधित कविता में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने भगवान शिव से भारतवर्ष में एक उद्याम राष्ट्रवाद की लहर , भारतीय पुनर्जागरण ( Indian Renaissance) लाने का आह्वान करते हैं । कविता की सुन्दर पंक्तियों को उद्धृत कर मैं आलेख का उपसंहार करता हूं ....
"कह दे शंकर से आज करें,
वह प्रलय नृत्य फिर एक बार।
सारे भारत में गुंज उठे,
हर -हर बम -बम का महोच्चार ।
तू मौन त्याग,कर सिंहनाद,
रे तपि ! आज तप का न काल।
नवयुग शंखध्वणि जगा रही,
तू जाग, जाग मेरे विशाल ।"
Tuesday, 27 February 2018
" जामुन्डीह में आन विराजे काशी के अधिशासि "
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment