गणतंत्र दिवस की परिवेला में ASEAN-INDIA Commemorative Summit- 2018 के उपलक्ष्य में आयोजित रामायण महोत्सव। शाम के 7 बजे हैं। कोपरनिकस मार्ग स्थित कमानी आडिटोरिम दर्शकों से खचाखच भरा है। मंच पर इंडोनेसिया से आई मंडली की रामायण पर आधारित नृत्य नाटिका "लेगोंग जाबोग" की प्रस्तुति चल रही है। बालि सुग्रीव का युद्ध औऱ भगवान राम का शऱसंधान। संवाद औऱ पार्श्व संगीत नाटिका को जीवन्त बना रहे हैं। अभी अभी मलेशिया के "क्षेत्रा अकादमी" की प्रस्तुति हुई है। पंचदिवसीय उत्सव का उद् घाटन दो दिन पूर्व थाइलैंड के 'खोन', 'रामाकीन' मास्क नृत्य नाटिकाओं के मंचन से हुआ। फिर म्यांमार के "रायल पोता'' तथा लाओस की "फ्रालाक फ्रालाम" (लाओ रामायण), तथा लाओ पी.डी.आर. की प्रस्तुति हुई। कल सिंगापुर के 'अप्सरा आर्ट्स' द्वारा "आंजनेयम हनुमान", कंबोडिया के संस्कृति एवं ललित कला मंत्रालय द्वारा "रेमके रामायण" एवं वियतनाम के "चाम ट्रेडिशनल आर्ट" ग्रुप की प्रस्तुतियां प्रायोजित हैं। अगले दिन ब्रुनेई एपिक की "शेरी राम" तथा फिलीपीन्स से आई रामायण मंडलियों की प्रस्तुति के साथ रामायण महोत्सव की पूर्णाहुति होगी।
दक्षिण पूर्व एशिया राष्ट्र संगठन Association of South East Asian Nations (ASEAN) के सभी सदस्य (इंडोनेशिया, सिंगापुर, फिलीपींस, मलेशिया, ब्रुनेई, थाईलैंड,कम्बोडिया, लाओस पी.डी.आर., म्यांमार, वियतनाम ) प्राचीन बृहत भारत के अंग प्रत्यंग रहे हैं। "कृण्वन्तुं विश्वमार्यम्" अर्थात् 'हम समस्त विश्व को आर्य बनाएं " यह हमारा वैदिक आदर्श रहा है। रामायण, महाभारत, भगवान बुद्ध की शिक्षाओं से हमने उन्हें संस्कारित किया। चक्रवर्ती सम्राटों ने वहां अपने उपनिवेश स्थापित किये। वहां की राजकुमारियों से विवाह सम्बन्ध हुए। उनसे हमारा व्यापारिक सम्पर्क हुआ। प्राचीन भारत का हमारा ये गौरवपूर्ण कालखंड था। दुर्भाग्य से मध्य काल में जब हम परतंत्र हुए , इन प्रदेशों से हमारे राजनैतिक संबन्ध विच्छेद हो गए। सैकड़ों वर्षों तक ये राष्ट्र भी पराधीन रहे। किन्तु प्रतिकुलताओं के वावजुद भी भारतीय संस्कृति वहां संरक्षित रही।
यह विडंबना रही कि स्वतंत्रता के लंम्बे अंतराल के पश्चात भी इन देशों से जुड़ने और इन्हें जोड़ने की आवश्कता नहीं समझी गई। पी. वि. नरसिंह राव जी की दिवंगत आत्मा को शांति मिले, जिन्होंने राष्ट्रवादियों के बढ़ते प्रभाव में पूर्व की ओर देखने ( Look East Policy) की आवश्कता समझी। हमारे यशश्वी प्रधानमंत्री की इन देशों से सांस्कृतिक गठबन्धन की रणनीति ( Act East Policy) भारतीय विदेश नीति का एक युगांतकारी अध्याय है। इस doctrine के तीन आयाम हैं, जिसे प्रधान मंत्री ने सहज ही तीन Cs अर्थात Commerce (वाणिज्य), Connectivity (सम्पर्क) एवं Culture (संस्कृति ) के माध्यम से व्यक्त किया । "आसियान- भारत : साझे मूल्य समान नियति" ASEAN-INDIA : Shared Values, Common Destiny" इस शिखर सम्मेलन का ध्येय वाक्य है। ये हर्ष की बात है कि यही सूत्र वाक्य प्रधान मंत्री जी की अभी -अभी जारी पुस्तिका का शीर्षक बना है।
तीन वर्ष पूर्व जब कम्बोडिया, लाओस एवम वियतनाम में भारतीय अतिथि अध्यापकों के panel के लिए मेरा नाम प्रस्तावित हुआ तो मैं रोमांचित हुआ। वैसे आसियान देशों मे मेरी अभिरुची दशकों पूर्व तब हुई जब मैं कालेज का छात्र था, तथा प्रख्यात प्राच्यविद्याविशारद प्रो० डा० हरवंशलाल ओबराय के सम्पर्क में आया। वह मेरे mentor, मार्गदर्शक बने। उनसे मैंने लेखन व वक्तृता सीखी। दुर्दैव से वह समय पूर्व दिवंगत हो गए। लेकिन समस्त विश्व में भारतीय प्रभाव व योगदान पर मेरा अध्ययन व शोध जारी रहा। दक्षिण पूर्व एशिया के देशों को भारत के साथ जोड़ने में रामायण, महाभारत तथा भगवान बुद्ध के जन्मान्तर पर आधारित जातक कथाओं ने सीमेंटिक फोर्स का कार्य किया है। भारत से आत्मीय जुड़ाव के कारण वे इसे पुण्यभूमि (holyland ) एवं पितृभूमि (forefather's land )मानते हैं। कम्बोडिया (कम्बुज) के अंकोरवाट ( वटबृक्ष का अंकुर, मूल ) स्थित बोरोवुद्दोर (वृहत बुध्द मंदिर) विश्व का विशालतम् हिन्दू मंदिर है। सम्पूर्ण इन्डोनेशिया (इन्डोनेशस अर्थात भारतीय द्विपसमुह) में भारतीय संस्कृति की छाप स्पष्ट देखी जा सकती है। वहां के मंदिरों की दीवारों पर रामायण एवं महाभारत के चित्र खुदे हुए हैं। ऋषि अगस्त ने जावा, सुमात्रा, बाली, कम्बोडिया, मलेशिया में भारतीय संस्कृति का ध्वज फहराया। यही कारण है कि यहां ऋषि अगस्त आज भी वन्दनीय हैं। जावा के प्रम्बन में रामायन के मूर्ति- शिल्प बड़े बेजोड़ हैं। इंडोनेशिया सहित इन सभी देशों में रामलीला की सुदीर्घ परंपरा को देखकर यहां के करोड़ो हृदयों में भारतीय संस्कृति से प्यार का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। मैनें इन कलाकारों से पूछा, " भई ! आप मुस्लिम हो, और आपके घरों की दीवारों पर रामायण व महाभारत के भीतिचित्र ? आप बड़े आनंदपूर्वक रामलीला खेलते हो?"(हिन्दी अनुवाद)। उन्होंने समवेत उत्तर दिया, "We have changed our religion, not our forefathers, We love Indian culture very much" ( हमारा धर्म परिवर्तन हुआ है, हमारे पूर्वज नहीं बदले हैं। हम भारतीय संस्कृति को बहुत प्यार करते हैं।) इंडोनेशिया का यह सामाजिक तानाबाना व मिजाज भारत सहित समस्त विश्व के लिए यदि पाथेय बने, तो पूरे विश्व में लोकतांत्रिक मूल्य प्रगाढ़ होंगे।
बहुत कम लोगों को यह पता है कि इंडोनेशिया के प्रथम राष्ट्रपति डा० सुकर्णो के पिता महाभारत के अच्छे विद्वान थे। महाभारत में कर्ण का चरित्र उन्हें बड़ा प्रिय था, किन्तु कर्ण का कौरवों (अधर्म, अनीति) के पक्ष में होना उन्हें बड़ा खलता था। इसलिए उन्होंने अपने पुत्र का नाम रखा सुकर्ण अर्थात् नीति का अनुगामी अच्छा कर्ण । डा० सुकर्णो के परिवार से जुड़ी एक और घटना का उल्लेख अप्रासांगिक नहीं होगा। इंडोनेशिया में जब तख्ता पलट हुआ तो सुकर्णो के परिवार को जाकार्ता से सुरक्षित नई दिल्ली लाने की जिम्मेवारी बीजु पटनायक जी को दी गई , जो उस समय इंडियन एयरलाइंस के पायलट थे। औपरेशन सफल रहा। इसी बीच सुकर्णों के घर एक कन्या का जन्म हुआ। कृतज्ञतावश सुकर्णों ने पुत्री को बीजु पटनायक जी के गोद में रखा, तथा उसका नामकरण करने का आग्रह किया । आसाढ श्रावन का महिना, आकाश में सुन्दर मेघ छाए थे। बालिका का नाम रखा गया -- मेघावती । आगस्त्य परंपर में पिता का नाम संतान के साथ जुड़ने की परिपाटी है, इस प्रकार बालिका का नाम पड़ा -- मेघावती सुकर्णोंपुत्री।
दक्षिण पूर्व एसिया सहित सम्पूर्ण विश्व में भारतीय प्रभाव का निदर्षन कराने वाली वाली मेरी भावी पुस्तक "Ramayan Travels Across the Globe" ,( रामायण की विश्व परिक्रमा ) शिघ्र प्रकाश्य है।
यह पुस्तक भारतीय विदेश नीति को एक नूतन दृष्टि प्रदान करेगी, मैं ऐसा समझता हूं । यह पुस्तक जितनी जल्द उपलब्ध हो , मुझे, उतनी प्रफूल्लता होगी । शुभमस्तु ।
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