"उत्तरं यत् समुद्रस्य, हिमाद्रि: चैव दक्षिणं।
वर्ष तद् भारतं नाम: भारती यस्य सन्तति:।"
विष्णुपुराण में भारत वर्ष के भौगोलिक परिसीमा (Geographical boundary) को ब्याख्यायित करते हुए कहा है कि जो देश समुद्र के उत्तर में तथा हिमालय के दक्षिण में स्थित है, वह भारतवर्ष है, तथा उसकी संतति भारतीय कहलाती है। अपनी भारतमांता के चरणों को पखारने वाले हिन्द महासागर के आंचल में स्थित कन्याकुमारी में हूं। देवी कन्याकुमारी जिसके नाम पर इस तीर्थस्थल का नामकरण हुआ, यहां का केन्द्रीय मन्दिर है। पौराणिक कथा यह है कि जब ब्रम्हाजी ने वाणासुर को देय वरदान कि वह अमर हो जाय , जगत के कल्याण के लिए अस्वीकार कर दिया, तब उसने कहा कि उसकी मृत्यु किसी कन्या के हाथ से हो। ब्रम्हा ने इसकी स्वीकृति प्रदान कर दी। अहंकारी दानव की समझ थी कि भला भोली भाली तन्वी कन्या से तो उसकी मृत्यु असंभव ही है। जब उसके आत्याचार से मानवता कराह उठी, तब ऋषि मुनि देवगणों का प्रतिनिधि मंडल भगवान विष्णु से मिला। उनके परामर्ष से आदि शक्ति की अराधना की गई। उन्हें आश्वासन मिला कि वह कन्या कुमारी के रुप में प्रकट होकर वाणासुर का वध करेंगी। देवी प्रकट हुईं और शिव को वर रुप में प्राप्त करने के लिए ( वरौं शम्भू नतो रहौं कुमारी ...राम चरित मानस) वह कठिन तप में लीन हो गई। देवर्षि नारद इस विवाह के संयोजक व आयोजक थे। विवाह का मुहुर्त ब्रम्ह वेला में था। विवाह निर्धारित मुहुर्त में निर्विघ्न सम्पन्न हो ऋषि नारद ने सुनिश्चित किया। लेकिन इधर देवगण बड़े परेशान हुए कि यदि यह विवाह हो गया, अर्थात देवी कन्याकुमारी न रहीं, तो वाणासुर से मानवता के परित्राण के अभियोजना की क्या परिणति होगी। अतएव उन्होंने ऋषि नारद को विश्वास में लिया, तथा उन्हें ही इस महती ईश्वरीय कार्य का दाइत्व सौंपा। शिव की बारात चल चुकी थी, किन्तु ऋषि नारद ने शच्चीन्द्रम मन्दिर में ही बारात रोके रखी, तथा अरुण शिखाध्वनि के माध्यम से प्रात:काल हो जाने की घोषना की। विवाह का मुहुर्त टल गया तथा देवी कुमारी ही रहीं, तथा वाणासुर का संहार हो पाया। इस दैविय अभियोजना के सम्मान में इस महान तीर्थ का नाम कन्याकुमारी पड़ा।
दक्षिण भारत की अन्य दर्जनों मंदिरों की भांति कन्याकुमारी जी का मंदिर अपनी भव्यता, विशालता, एवं शिल्पकला मेंअनुपम हैं। यह हर्ष का विषय है कि उत्तर भारत के अपने भब्य मंदिरों यथा सोमनाथ, काशीविश्वनाथ, अयोध्या, मथुरा की भांति दक्षिण भारत के अपने मंदिरों पर बर्बर मुस्लिम आक्रांताओं की वैसी गृद्ध दृष्टि नहीं पड़ी है। ये भब्य मंदिर यहां के भाई-बहनों के दैनिक अनुष्ठानों के महत्वपूर्ण अंग हैं। इनके प्रति लोगों की अगाध श्रद्धा बड़ी अल्हादकारी है।
कन्याकुमारी मंदिर के बिल्कुल निकट स्थित विवेकानन्द शिला स्मारक आधुनिक भारत का एक सुन्दरतम तीर्थ है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा है कि यदि आप भारत को समझना चाहते हैं तो विवेकान्द का अध्ययन कीजिए, यहां सब कुछ सकारात्मक है, नकारात्मक कुछ भी नहीं। स्वामी विवेकान्द के जीवन दर्शन में अपने गौरवशाली अतित, दैन्य वर्तमान एवं उज्ज्वल भविष्य का अद्भुत संगम है। श्री गुरुजी की प्रेरणा से संघ के वरीष्ठ प्रचारक श्रद्धेय एकनाथ जी रानाडे के कठोर तप, 323 माननीय सांसदों की सम्मति एवं संसद में निर्णय के परिणाम स्वरुप छठे एवं सातवें लगभग दो दशक में हजारों मनीषियों के अथक श्रम से यह स्मारक बना है। श्री एकनाथ जी ने किस प्रकार प्रतिकूल परिस्थति में भी अमने सम एवं विषम विचार के वंधुओं, सांसदों को अपनी विनम्रता, एवं प्यार से विश्वास में लेकर यह अभिनव यज्ञ सम्पन्न करवाया, यह हमारा राष्ट्रीय पाथेय है। विवेकानन्द केन्द्र का कण कण इस पाथेय की कथा का वक्ता है। यहां "रामायण प्रदर्शनी", "भारतमाता दर्शनम", "विवेकानन्द चित्र प्रदर्शनी", एवं एकनाथ जी की जीवनवृत दर्शिनी "गंगोत्री" दर्शकों एवं शोधार्थियों को वरवश आकर्षित करते है। इन विषयों पर शोध एवं लेखन के लिए यहां विपुल श्रोत एवं सन्दर्भ भरे पड़े हैं। विवेकान्द केन्द्र का आतिथ्य स्वीकार कर हम कृतार्थ हुए। कन्याकुमारी के तीनदिवसीय प्रवास में सूर्योदय एवं सूर्यास्त की नयनाभिराम दृष्य के अतिरिक्त हम लोगों ने मां कन्याकुमारी के पद्कमल चिन्ह, शचीन्द्रम मंदिर, गगनेश्ववर शिव, दत्तत्रेय मंदिर, संतकवि तिरुवल्लुवर प्रतिमा, महात्मा गांधी स्मारक, साई मंदिर इत्यादि के दर्शन किया। रात्री कन्याकुमारी- रामेश्वरम एक्सप्रेस से प्रस्थान कर बड़े सवेरे रामेश्वरम पहुंचे। हम लोग बड़ी प्रफूल्लित थे कि यह बावुजी की चौथे धाम की यात्रा थी। पहले धाम की यात्रा तब हुई, जब वह युवा थे और मैं शिशु था। वर्ष 1966-67 की बात है, जब तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने गुजरात कच्छ के एक भाग को पाकिस्तान को देने का निर्णय किया। तत्कालीन "भारतीय जनसंघ"(भारतीय जनता पार्टी के पूर्व जन्म का नाम) ने इसके विरोध में देश भर में सत्याग्रह, प्रदर्शन किया। बावुजी ने तत्कालीन बिहार प्रांत के सत्याग्रहियों का नेतृत्व किया तथा अपने जत्थे के साथ प्रदर्शन स्थल कच्छ पहुंचे। कच्छ सत्याग्रह के पश्चात उन्होने द्वारिका पूरी, सोमनाथ के दर्शन किया। कुछ वर्ष पूर्व मैने माता- पिता को जगन्नाथ पूरी की यात्रा कराई। फिर बावुजी की बदरीकाश्रम (गंगोत्री, यमुनोत्री केदारनाथ) के साथ साथ वैश्नव देवी एवं स्वर्णमंदिर, अमृतसर की यात्रा हुई। रामेश्वरम् में रामनाथ स्वामी मंदिर की मुख्य विथि में ही आवास लिया। स्नानादि के पश्चात चल पड़े अपने प्रिय प्रभू के दर्शन को। अपनी सेना सहित लंका प्रस्थान से पूर्व अपने दृढ़ संकल्प की सिद्धि के लिए भगवान राम ने अपने कर कमलों से भगवान शिव की स्थापना की। "रामस्य ईश्वर: य: इति रामेश्वर:" ( राम के ईश्वर हैं जो अर्थात रामेश्वर ) या "राम: इव ईश्वर: यस्य इति रामेश्वर:" ( राम ही ईश्वर हैं जिसके अर्थात रामेश्वर) यही बावुजी के साथ मेरी परिचर्चा का विषय था। रामायण के विविध प्रसंगों पर उत्साह पूर्वक बोलना बावुजी की प्रिय अभिरुचि रही है। अपने प्रिय प्रभु के दर्शन कर बावुजी इतने आल्हादित हुए कि उनकी शारीरिक अक्षमता शुन्य से गुणित हो गई। प्रधानमंत्री द्वारा सद्य उद्द्घाटित एपीजे अव्दुल कलाम जी के स्मारक की भब्यता के क्या कहने! धनुष्कोटि से लौटते हुए हमने विभीषण जी का प्रभु राम द्वारा राज्याभिषेक स्थल पर निर्मित मंदिर देख। फिर हम श्रीकलाम जी के घर गए। रामेश्वरम् में सेतुवन्धन एवं भगवान राम, लक्ष्मण, हनुमान से जुड़े सैकड़ों स्मृति स्थल हैं, जो आज हमें अपने अपनी संस्कृति के मानविन्दुओं से जोड़ते हैं। तिरुअनंतपूरम पहुंचने के पूर्व मदुरै हमारा पड़ाव बना। मदुरै मध्यकालीन दक्षिण भारत का महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केन्द्र रहा है। मदुरै सिल्क साड़ियों के प्रति अल्पना रानी जी की दिवानगी की तारीफ करनी पड़ेगी। उनके नेतृत्व में हम लोग इन साड़ियों के एक्सक्लुसिव शो रुम पहुंचे। उन्होंने आगामी दोनो नवरात्रनों, तीज, करवाचौथ, आगले विवाह समारोहों के लिए इकट्ठे खरीददारी की। उनकी संतुष्टी ने मुझे बड़ी प्रसन्नता प्रदान की। ऐतिहासिक मीणांक्षी मंदिर मदुरै की पहचान रही है। हम लोगों ने बड़े सवेरे मंदिर पहुंचकर जगत के मांता पिता (जगतपितरौ वन्दे पार्वती परमेश्वरौ ....महाकवि कालिदास) की अभ्यर्थना की। तिरुअनंतपूरम् हमारा बेस कैम्प बना। हज़रत निजामुद्दीन तिरुअनंतपूरम् राजधानी एक्सप्रेस से चलकर हम तिरुअनंतपूरम् ही पहुचे थे, फिर कन्याकुमारी व रामेश्वरम् के लिए प्रस्थान किया था। नई दिल्ली की हमारी वापसी यात्रा इसी ट्रेन में थी। अपरान्ह वापस हम तिरुअनंतपूरम् पहुंचे। प्रात:काल पूर्ण राष्ट्रीय परिवेश धोती धारण कर हम श्री पद्मनाभ स्वामी के दर्शन को उपस्थित हुए। बचपन से "शांताकारं भूजग शयनम् पद्मनाभं सुरेशं " गाता रहा हूं। प्रत्यक्ष विश्वाधारं, गगनसदृसं, मेघवर्ण्यं, शुभांगम् लक्ष्मीकांतं, कमलनयनम् , शेषशायी विष्णु का साक्षात्कार कर अभिभूत हो गया। केरल जगत्गुरु शंकराचार्य का गृह प्रदेश है। यहां भगवान ने मांता शेवरी के जुठे बेर खाए। सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में पूजित महर्षि अगस्त की कुटि यहीं है, जिन्होंने भगवान राम को सदियों से संरक्षित अस्त्र शस्त्र भेंट किया। इसे ठीक ही भगवान का अपना घर कहा गया है। यहां पग पग पर शिव- पार्वती, विष्णु- लक्ष्मी, राम, कृष्ण की उपस्थिति की अनुभूति की जा सकती है।डा० मनोहर लोहिया ने ठीक ही कहा है कि भगवान राम ने भारत को उत्तर से दक्षिण तथा कृष्ण ने पूरब से पश्चिम को जोड़ा। सचमुच राम कृष्ण, शंकराचार्य, विवेकानन्द, तिरुवल्लुवर प्रभृति विभूतियां भारतवर्ष की सांस्कृतिक राष्ट्रीय एकता को सशक्त बनाने वाली महत्वपूर्ण कड़ियां हैं। विश्व में जबतक इनका सम्मान रहेगा, भारतवर्ष जगत् गुरु बना रहेगा।
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