Friday, 24 November 2017

पुस्तक समीक्षा: महाराजा हरिसिंह : एक अप्रतिम योद्धा

डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री कृत  "जम्मू-कश्मीर के जननायक महाराजा हरि सिंह " जम्मू-कश्मीर पर लिखे अब तक  की सर्वाधिक तथ्यात्मक पुस्तकों में से एक है। पुस्तक के सम्यक पारायण से कोई भी पाठक यह समझ सकता है कि जम्मू-कश्मीर के सन्दर्भ मेंऐतिहासिक तथ्यों से इतर एक कपटपूर्ण साजिश के तहत कइ भ्रम व अफवाहें फैलाई गई हैं, यथा हरिसिंह जी जम्मू-कश्मीर को स्वतंत्र रखना चाहते थे, वह इसके भारत में विलय के पक्षधर नहीं थे आदि ,आदि । ऐसा कहकर न केवल महाराजा की राष्ट्र चेतना पर ऊंगली उठाई जाती है, अपितु उनके व्यक्तित्व की छवि भी खराब की जाती है। यह  ऐतिहासिक तथ्यों के साथ धोखाधड़ी है। अपनी नई पीढ़ी को झुठा इतिहास पढ़ाने का वही हस्र होता है जो आज का पाकिस्तान स्वयं झेलने को अभिशप्त है। तथ्य यह है कि हरि सिंह जी एक प्रखर राष्ट्रवादी थे। 30 वर्ष  की आयु में, 1925 में  जब वह महाराजा बने, अपने सद्गुणों के कारण वह बहुत जल्द अपनी प्रजा के प्रियपात्र बन गए। 1931में प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भारतीय राजाओं एवं रियासतों के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया, तथा अपने संबोधन में अंग्रेजों के घर लंदन में उन्हें चुनौती दी। भला ऐसा देशभक्त महाराजा अपने साम्राज्य का भारत में विलय का विरोध करेगा? क्या वह इतिहास के इस मोड़ पर तेजी से बदलते राजनीति की  हवा को भांपने में इतना अल्प बुद्धि होगा? दरअसल पं० जवाहर लाल नेहरू का महाराजा हरिसिंह जी के साथ वैसा ही सम्बन्ध था, जैसा उनका अन्य राष्ट्रवादी मनीषियों यथा सरदार वल्लभ भाई पटेल, सुभाष चन्द्र बोस, डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, डा० श्यामा प्रसाद मुखर्जी, डॉ भीमराव अंबेडकर, डॉ० राम मनोहर लोहिया इत्यादि के साथ था। पुस्तक के लेखक डॉ अग्रिहोत्री कहते हैं कि जवाहर लाल नेहरू महाराजा को अपमानित करने का कोई अवसर खोना नहीं चाहते थे। अन्तत: उन्होंने उन्हें जम्मू-कश्मीर से निर्वासित ही  करवा दिया। सम्पूर्ण  सन्दर्भ देश विभाजन के दुखद दौर का है।

लेखक डॉ० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री कहते हैं कि महाराजा हरिसिंह जी तीन- तीन मोर्चों पर अकेले लड़ रहे अप्रतिम योद्धा थे। लार्ड  माउंटबेटन पहले मोर्चे पर थे जो उन्हें जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने  को बाध्य कर रहे थे। पाकिस्तान दूसरे मोर्चे पर था जो अपना राक्षसी मुंह फैलाए जम्मू-कश्मीर को निगल जाने को उद्यत था।  जवाहर लाल नेहरू तीसरे मोर्चे पर थे।  डॉ० अग्निहोत्री कहते हैं कि पहले दो मोर्चों पर महाराजा विजयी रहे, यदि तीसरे मोर्चे पर भी वह विजयी होते तो जम्मू-कश्मीर की जो त्रासदी भारत वर्ष आज झेल रहा है , वह विल्कुल नहीं होता। कुलदीप चन्द अग्निहोत्री ने  इस पुस्तक में यह स्थापना की है कि जम्मू-कश्मीर आज यदि भारत का अंग है तो इसका श्रेय महाराजा हरि सिंह जी को जाता है, जबकि झुठे प्रोपगैंडा फैलाकर उन पर ऐतिहासिक दोषारोपण किया जाता है। सम्पूर्ण सन्दर्भों एवं तथ्यों के सम्यक विश्लेषण कर लेखक डॉ० अग्निहोत्री  कहते हैं कि जवाहर लाल नेहरू की वह मानसिकता जिसके अधीन वह काम कर रहे थे, सभी विकट परिस्थितियों के लिए जिम्मेवार थी। नेहरू के मनोविज्ञान का जैसा सूक्ष्म विश्लेषण यहां किया गया है, अन्यत् दुर्लभ है। 

इतिहासकार कहते हैं कि यदि जवाहर लाल नेहरू ने  महात्मा गांधी की बात मान ली होती, तो देश विभाजन की दुखद त्रासदी टल सकती थी। किन्तु  वह अपनी सुविधा के अनुसार गांधी की वही बात मानते थे जो उनके अनुकूल होता था। ये विडंबना है कि जिन्ना और जवाहर लाल के  बीच  कड़वाहट कम करने के महात्मा गांधी के सारे प्रयास निष्फल रहे और जवाहर लाल नेहरू स्वयं मोहम्मद अली  जिन्ना से पटकनी खा गए । इसकी क्षतिपूर्ति तथा विश्व पटल पर उनकी छवि मुस्लिम विरोधी न बने इसके लिए  उन्होंने शेख अब्दुल्ला को सर पर बिठा लिया। शेख़ अब्दुल्ला ,जो महाराजा की मां, बहन, बहु ,बेटी को नाम लेकर गालियां देता और दिवारों पर लिखवाता था, जवाहर लाल सदा उसकी पीठ थपथपाते। शेख़ अब्दुल्ला ने ही जवाहर लाल नेहरू को भारतीय संविधान में धारा 370 तथा 35A का पचड़ा घुसेड़ने  को वाध्य किया। इस प्रकार  जवाहर लाल नेहरू के लम्हों की खता को  हमारा देश सदियों तक झेलने को अभिशप्त है। महाराजा हरि सिंह जी सरदार वल्लभ भाई पटेल तथा समस्त राष्ट्र की इच्छा की इच्छा के अनुरूप जम्मू-कश्मीर को अन्य रियासतों के समान भारत वर्ष में विलय के आकांक्षी थे, किन्तु दुर्दैववश  यदि जम्मू-कश्मीर का वह स्वरुप नहीं रहा, जो अन्य राज्यों का है, तो इसक लिए सम्पूर्णत: जिम्मेवार जवाहर लाल नेहरू जी हैं, क्योंकि उन्होंने महाराजा को वह सम्मान व श्रेय नहीं दिया, जो वह शेख़ अब्दुल्ला को देने को प्रतिबद्ध थे । संभव है उनका शेख़ साहब से  कोई नाता रहा हो। महाराजा हरिसिंह जी के पुत्र डा० कर्ण सिंह जी,  जिन्होंने मेरी एक सद्य प्रकाशित ग्रंथ की प्रस्तावना लिखी एवं लोकार्पण किया, से मैंने जम्मू-कश्मीर की त्रासदी पर कुछ टिप्पणी करने को कहा । वह गंभीर हो गए। उनकी पीड़ा  उनके चेहरे से पढ़ी जा सकती थी। हिन्दी फिल्मों के दर्द भरे इस नगमे को उद्धृत कर वह सब कुछ कह गए.... "अजीब दास्तां है ये, कहां शुरू, कहां खतम । ये मंजिलें  हैं कौन सी, न वो समझ सके, न हम।"    तथास्तु ।                                          (स्वस्थ व सकारात्मक  टिप्पणी अपेक्षित )

No comments:

Post a Comment